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श्रीमद्भगवद्गीता १२.८ — मय्येव मन आधत्स्व — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता १२.८ — मय्येव मन आधत्स्व

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

मयि
mayi
मुझमें
एव
eva
ही
मनः
manaḥ
मन
आधत्स्व
ādhatsva
स्थिर करो
मयि
mayi
मुझमें
बुद्धिम्
buddhim
बुद्धि
निवेशय
niveśhaya
समर्पित करो
निवसिष्यसि
nivasiṣhyasi
तुम सदा निवास करोगे
मयि
mayi
मुझमें
एव
eva
ही
अत ऊर्ध्वम्
ataḥ ūrdhvam
तदुपरान्त
na
नहीं
संशयः
sanśhayaḥ
संशय

Complete Translation

तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 8

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

बारहवें अध्याय, भक्ति योग में, अर्जुन पूछते हैं कि जो भगवान के साकार रूप की उपासना करते हैं अथवा जो अव्यक्त ब्रह्म की, उनमें कौन योग में अधिक श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण प्रेममयी भक्ति के मार्ग को सराहते हैं और इस श्लोक में सबसे प्रत्यक्ष विधि देते हैं — मन और बुद्धि को उनमें स्थिर करो। आगे के श्लोकों में वे कृपापूर्वक उनके लिए सरल विकल्प भी बताते हैं जो ऐसा नहीं कर सकते।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 12.8 का मूल उपदेश क्या है?
यह सिखाता है कि मन और बुद्धि दोनों को भगवान में स्थिर करने से मनुष्य अन्ततः उन्हीं में निवास करता है। मन भाव और ध्यान का प्रतीक है; बुद्धि निश्चय और विवेक का। दोनों को श्रीकृष्ण की ओर लगाना ही भक्ति का सार है।
यहाँ 'मन' और 'बुद्धि' में क्या अन्तर है?
वेदान्त में मन (मनस्) विचार, भाव और ध्यान का स्थान है, जबकि बुद्धि विवेक, निर्णय और निश्चय की शक्ति है। श्रीकृष्ण भक्त से दोनों को लगाने को कहते हैं — उनके प्रति प्रेम अनुभव करना और उनकी सत्ता में दृढ़ विश्वास रखना।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण क्या वचन देते हैं?
वे वचन देते हैं कि जो भक्त मन और बुद्धि को उनमें स्थिर करता है वह 'निश्चय ही इसके पश्चात् मुझमें ही निवास करेगा' — इसमें कोई संशय नहीं। यह भक्ति द्वारा मुक्ति का प्रत्यक्ष आश्वासन है।
क्या यह श्लोक ध्यान के आरम्भिक साधकों के लिए उपयुक्त है?
हाँ। यह गीता के सबसे व्यावहारिक और उत्साहवर्धक श्लोकों में से एक है। इसमें किसी जटिल अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं — केवल परमात्मा में सच्ची, प्रेमपूर्ण एकाग्रता, जिसे कोई भी तुरन्त आरम्भ कर सकता है।

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