Mantra.Tips
bhagavad-gitagitakrishnabhakti-yoga

श्रीमद्भगवद्गीता १२.८ — मय्येव मन आधत्स्व

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 प्रातः या सायं ध्यान के समय, अथवा सोने से पूर्व मन को भगवान में स्थिर करने के लिए।·📜 Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 8

अन्य नाम / खोज: mayy eva mana adhatsva · mayi eva mana adhatsva · bhagavad gita 12.8 · gita 12 8 · fix your mind on me

Share:

अर्थ

भक्ति योग नामक बारहवें अध्याय का यह श्लोक भक्ति के सार पर भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष एवं आत्मीय उपदेश है — अपने मन को मुझमें स्थिर करो और अपनी बुद्धि को मुझमें लगाओ, तब तुम निश्चय ही मुझमें ही निवास करोगे। यह साधना का पूर्ण सूत्र है, जिसमें भावना (मन) और विवेक (बुद्धि) दोनों को परमात्मा में लगाया जाता है। भगवान पूर्ण निश्चय के साथ आश्वासन देते हैं — 'इसमें कोई संशय नहीं है।'

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 8 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

बारहवें अध्याय, भक्ति योग में, अर्जुन पूछते हैं कि जो भगवान के साकार रूप की उपासना करते हैं अथवा जो अव्यक्त ब्रह्म की, उनमें कौन योग में अधिक श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण प्रेममयी भक्ति के मार्ग को सराहते हैं और इस श्लोक में सबसे प्रत्यक्ष विधि देते हैं — मन और बुद्धि को उनमें स्थिर करो। आगे के श्लोकों में वे कृपापूर्वक उनके लिए सरल विकल्प भी बताते हैं जो ऐसा नहीं कर सकते।

शास्त्रों में वर्णित

भक्ति परम्परा के सन्त, जैसे आळवार और वैष्णव आचार्य, कहे जाते हैं कि उन्होंने केवल इसी एक उपदेश का पालन करके भगवान का साक्षात्कार किया — मन और बुद्धि को दिन-रात श्रीकृष्ण में लीन रखते हुए, जब तक भगवान उनके नित्य सहचर न बन गए।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं संशयः॥

mayy eva mana ādhatsva mayi buddhiṁ niveśhaya nivasiṣhyasi mayy eva ata ūrdhvaṁ na sanśhayaḥ

अर्थ:तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

मयि🔊mayiमुझमें
एव🔊evaही
मनः🔊manaḥमन
आधत्स्व🔊ādhatsvaस्थिर करो
मयि🔊mayiमुझमें
बुद्धिम्🔊buddhimबुद्धि
निवेशय🔊niveśhayaसमर्पित करो
निवसिष्यसि🔊nivasiṣhyasiतुम सदा निवास करोगे
मयि🔊mayiमुझमें
एव🔊evaही
अत ऊर्ध्वम्🔊ataḥ ūrdhvamतदुपरान्त
🔊naनहीं
संशयः🔊sanśhayaḥसंशय

श्रीमद्भगवद्गीता १२.८ — मय्येव मन आधत्स्व पाठ के लाभ

श्रीकृष्ण की दैनिक भक्ति एवं ध्यान के लिए पूर्ण और सरल सूत्र

मन (भावना) और बुद्धि (विवेक) दोनों को परमात्मा में टिकाना सिखाता है

चंचल मन को ईश्वर में स्थिर कर गहन आन्तरिक शान्ति प्रदान करता है

श्रीकृष्ण का व्यक्तिगत आश्वासन संशय मिटाकर श्रद्धा को दृढ़ करता है

साधक को क्रमशः भगवान में निरन्तर निवास की ओर ले जाता है

भक्ति योग (प्रेममयी भक्ति) के मार्ग का आरम्भ करने वालों के लिए आदर्श

श्रीमद्भगवद्गीता १२.८ — मय्येव मन आधत्स्व जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयप्रातः या सायं ध्यान के समय, अथवा सोने से पूर्व मन को भगवान में स्थिर करने के लिए।

रीढ़ सीधी रखकर सुखपूर्वक बैठें। श्वास को शान्त करने के पश्चात् श्लोक का पाठ करें और फिर उसके उपदेश का अभ्यास करें — श्रीकृष्ण के किसी चुने हुए रूप या नाम पर अपना ध्यान (मन) धीरे-धीरे रखें, और अपनी विवेकशील बुद्धि को उनकी उपस्थिति के विश्वास में टिकाएँ। मन भटके तो उसे पुनः लौटाएँ। प्रतिदिन ऐसे कुछ मिनटों का अभ्यास, समय के साथ निरन्तर करते रहने पर इस श्लोक को सार्थक करता है। माला पर 108 बार जप किया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह सिखाता है कि मन और बुद्धि दोनों को भगवान में स्थिर करने से मनुष्य अन्ततः उन्हीं में निवास करता है। मन भाव और ध्यान का प्रतीक है; बुद्धि निश्चय और विवेक का। दोनों को श्रीकृष्ण की ओर लगाना ही भक्ति का सार है।
वेदान्त में मन (मनस्) विचार, भाव और ध्यान का स्थान है, जबकि बुद्धि विवेक, निर्णय और निश्चय की शक्ति है। श्रीकृष्ण भक्त से दोनों को लगाने को कहते हैं — उनके प्रति प्रेम अनुभव करना और उनकी सत्ता में दृढ़ विश्वास रखना।
वे वचन देते हैं कि जो भक्त मन और बुद्धि को उनमें स्थिर करता है वह 'निश्चय ही इसके पश्चात् मुझमें ही निवास करेगा' — इसमें कोई संशय नहीं। यह भक्ति द्वारा मुक्ति का प्रत्यक्ष आश्वासन है।
हाँ। यह गीता के सबसे व्यावहारिक और उत्साहवर्धक श्लोकों में से एक है। इसमें किसी जटिल अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं — केवल परमात्मा में सच्ची, प्रेमपूर्ण एकाग्रता, जिसे कोई भी तुरन्त आरम्भ कर सकता है।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides