श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ — सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ — सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
सर्वस्य
sarvasya
समस्त प्राणियों के
च
cha
और
अहम्
aham
मैं
हृदि
hṛidi
हृदय में
सन्निविष्टः
sanniviṣhṭaḥ
स्थित, विराजमान
मत्तः
mattaḥ
मुझसे
स्मृतिः
smṛitiḥ
स्मृति
ज्ञानम्
jñānam
ज्ञान
अपोहनम्
apohanam
विस्मृति, अपोहन
च
cha
तथा, साथ ही
वेदैः
vedaiḥ
वेदों द्वारा
च
cha
और
सर्वैः
sarvaiḥ
समस्त
अहम्
aham
मैं
एव
eva
ही, केवल
वेद्यः
vedyaḥ
जानने योग्य
वेदान्तकृत्
vedānta-kṛit
वेदान्त का रचयिता
वेदवित्
veda-vit
वेदों के अर्थ का ज्ञाता
एव
eva
ही, केवल
च
cha
और
अहम्
aham
मैं
Complete Translation
मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 15, Verse 15
Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)
Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
पुरुषोत्तम योग के पराकाष्ठा-उपदेश में श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि वे किस प्रकार समस्त अस्तित्व में व्याप्त होकर उसे धारण करते हैं। इस श्लोक में वे प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्मृति और ज्ञान के स्रोत रूप में अपनी उपस्थिति प्रकट करते हैं, और स्वयं को समस्त वेदों तथा वेदान्त का विषय एवं लक्ष्य घोषित करते हैं।
Frequently Asked Questions
भगवद्गीता १५.१५ का क्या अर्थ है?▼
श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि वे समस्त प्राणियों के हृदय में अन्तरात्मा रूप में स्थित हैं; उन्हीं से स्मृति, ज्ञान और विस्मृति उत्पन्न होती है। वे समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हैं, और स्वयं वेदान्त के रचयिता तथा वेदों के ज्ञाता हैं। यह ईश्वर को हृदय के अन्तर्यामी और समस्त शास्त्रों के लक्ष्य दोनों रूप में सिद्ध करता है।
'अन्तर्यामी' क्या है?▼
अन्तर्यामी का अर्थ है 'भीतर का नियन्ता' या 'अन्तर्वासी' — परमेश्वर जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में साक्षी और मार्गदर्शक रूप में उपस्थित हैं। यह श्लोक वेदान्त के केन्द्रीय अन्तर्यामी सिद्धान्त का प्रमुख शास्त्रीय आधार है।
ईश्वर ज्ञान और विस्मृति दोनों के स्रोत कैसे हो सकते हैं?▼
सूक्ष्म इन्द्रियों को नियन्त्रित करने वाले अन्तर्यामी भगवान के रूप में, वे व्यक्ति के कर्म और ग्रहणशीलता के अनुसार स्मरण और समझ प्रदान करते हैं, और इसी प्रकार विस्मृति भी होने देते हैं। इसलिए भक्त उन्हें अपना स्रोत मानकर स्पष्ट स्मृति और सम्यक् ज्ञान के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं।
यह श्लोक शास्त्र के अध्येताओं के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?▼
यह घोषणा करता है कि समस्त वेदों का अन्ततः लक्ष्य श्रीकृष्ण ही हैं ('समस्त वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ')। साधक के लिए इसका अर्थ है कि समस्त अध्ययन का लक्ष्य हृदय में स्थित भगवान का साक्षात्कार है, जो भक्ति को ज्ञान के साथ समन्वित करता है।
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