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श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ — सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 प्रातःकाल के ध्यान या स्वाध्याय के समय; हृदय-केन्द्रित चिन्तन के लिए उत्तम·📜 Bhagavad Gita Chapter 15, Verse 15

अन्य नाम / खोज: sarvasya chaham hridi sannivishto · sarvasya cha aham hridi · bhagavad gita 15.15 · gita 15 15 · god in the heart verse

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अर्थ

भगवद्गीता की सबसे महिमामय आत्म-घोषणाओं में से एक — श्रीकृष्ण प्रकट करते हैं कि वे समस्त प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं, और उन्हीं से स्मृति, ज्ञान तथा उनका अभाव (अपोहन) होता है। वे आगे कहते हैं कि समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य वस्तु वे ही हैं, और वेदान्त के रचयिता तथा वेदों के ज्ञाता भी वे ही हैं। यह श्लोक भगवान को अन्तर्यामी आत्मा एवं समस्त शास्त्रों के परम लक्ष्य के रूप में स्थापित करता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 15, Verse 15 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

पुरुषोत्तम योग के पराकाष्ठा-उपदेश में श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि वे किस प्रकार समस्त अस्तित्व में व्याप्त होकर उसे धारण करते हैं। इस श्लोक में वे प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्मृति और ज्ञान के स्रोत रूप में अपनी उपस्थिति प्रकट करते हैं, और स्वयं को समस्त वेदों तथा वेदान्त का विषय एवं लक्ष्य घोषित करते हैं।

शास्त्रों में वर्णित

वेदान्त परम्परा के आचार्य इस श्लोक को भगवान की अपनी इस पुष्टि के रूप में उद्धृत करते हैं कि वे भीतर अन्तर्यामी रूप में निवास करते हैं; सन्त बताते हैं कि इस अन्तर्यामी भगवान से ज्ञान के लिए की गई सच्ची प्रार्थना अकस्मात स्पष्टता और विस्मृत सत्यों की स्मृति से उत्तरित हुई।

मंत्र

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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥

sarvasya chāhaṁ hṛidi sanniviṣhṭo mattaḥ smṛitir jñānam apohanaṁ cha vedaiśh cha sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛid veda-vid eva chāham

अर्थ:मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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सर्वस्य🔊sarvasyaसमस्त प्राणियों के
🔊chaऔर
अहम्🔊ahamमैं
हृदि🔊hṛidiहृदय में
सन्निविष्टः🔊sanniviṣhṭaḥस्थित, विराजमान
मत्तः🔊mattaḥमुझसे
स्मृतिः🔊smṛitiḥस्मृति
ज्ञानम्🔊jñānamज्ञान
अपोहनम्🔊apohanamविस्मृति, अपोहन
🔊chaतथा, साथ ही
वेदैः🔊vedaiḥवेदों द्वारा
🔊chaऔर
सर्वैः🔊sarvaiḥसमस्त
अहम्🔊ahamमैं
एव🔊evaही, केवल
वेद्यः🔊vedyaḥजानने योग्य
वेदान्तकृत्🔊vedānta-kṛitवेदान्त का रचयिता
वेदवित्🔊veda-vitवेदों के अर्थ का ज्ञाता
एव🔊evaही, केवल
🔊chaऔर
अहम्🔊ahamमैं

श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ — सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो पाठ के लाभ

भगवान को प्रत्येक हृदय में स्थित अन्तर्यामी आत्मा के रूप में प्रकट करता है

यह सान्त्वनादायक बोध लाता है कि ईश्वर सदा हमारे भीतर उपस्थित हैं

श्रीकृष्ण को स्मृति, ज्ञान और विवेक के स्रोत रूप में सम्मानित करता है

उन्हें समस्त वेदों और वेदान्त के परम तात्पर्य रूप में स्थापित करता है

भक्ति और आत्म-ज्ञान दोनों को एक साथ गहरा करता है

हृदय में विराजमान दिव्य को खोजने के लिए अन्तर्मुख होने को प्रेरित करता है

श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ — सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयप्रातःकाल के ध्यान या स्वाध्याय के समय; हृदय-केन्द्रित चिन्तन के लिए उत्तम

शान्त बैठकर अपना ध्यान हृदय-प्रदेश की ओर लाएँ। इस श्लोक का पाठ करें और चिन्तन करें कि परमेश्वर भीतर मौन साक्षी और स्मृति व ज्ञान के दाता रूप में विराजमान हैं। स्पष्ट समझ (स्मृति और ज्ञान) के लिए उनसे प्रार्थना करें। यह श्लोक शास्त्र का अध्ययन करने वालों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि यह भगवान को समस्त वेदों का लक्ष्य प्रकट करता है। इसका १०८ बार जप किया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि वे समस्त प्राणियों के हृदय में अन्तरात्मा रूप में स्थित हैं; उन्हीं से स्मृति, ज्ञान और विस्मृति उत्पन्न होती है। वे समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हैं, और स्वयं वेदान्त के रचयिता तथा वेदों के ज्ञाता हैं। यह ईश्वर को हृदय के अन्तर्यामी और समस्त शास्त्रों के लक्ष्य दोनों रूप में सिद्ध करता है।
अन्तर्यामी का अर्थ है 'भीतर का नियन्ता' या 'अन्तर्वासी' — परमेश्वर जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में साक्षी और मार्गदर्शक रूप में उपस्थित हैं। यह श्लोक वेदान्त के केन्द्रीय अन्तर्यामी सिद्धान्त का प्रमुख शास्त्रीय आधार है।
सूक्ष्म इन्द्रियों को नियन्त्रित करने वाले अन्तर्यामी भगवान के रूप में, वे व्यक्ति के कर्म और ग्रहणशीलता के अनुसार स्मरण और समझ प्रदान करते हैं, और इसी प्रकार विस्मृति भी होने देते हैं। इसलिए भक्त उन्हें अपना स्रोत मानकर स्पष्ट स्मृति और सम्यक् ज्ञान के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं।
यह घोषणा करता है कि समस्त वेदों का अन्ततः लक्ष्य श्रीकृष्ण ही हैं ('समस्त वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ')। साधक के लिए इसका अर्थ है कि समस्त अध्ययन का लक्ष्य हृदय में स्थित भगवान का साक्षात्कार है, जो भक्ति को ज्ञान के साथ समन्वित करता है।

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