श्रीमद्भगवद्गीता १८.५६ — सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता १८.५६ — सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
सर्वकर्माणि
sarva-karmāṇi
समस्त कर्म; सब प्रकार के कार्य
अपि
api
यद्यपि; भी
सदा
sadā
सदा, सर्वदा
कुर्वाणः
kurvāṇaḥ
करते हुए; कर्म में लगा हुआ
मद्व्यपाश्रयः
mad-vyapāśhrayaḥ
मेरा पूर्ण आश्रय लेने वाला
मत्प्रसादात्
mat-prasādāt
मेरी कृपा से
अवाप्नोति
avāpnoti
प्राप्त करता है; पा लेता है
शाश्वतम्
śhāśhvatam
शाश्वत
पदम्
padam
पद; स्थान
अव्ययम्
avyayam
अव्यय; अविनाशी
Complete Translation
सब प्रकार के कर्मों को सदा करते हुए भी जो मेरा आश्रय लेता है, वह मेरी कृपा से शाश्वत और अव्यय (अविनाशी) पद को प्राप्त कर लेता है।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 56
Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)
Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
अठारहवें अध्याय, मोक्ष संन्यास योग में, जब श्रीकृष्ण कर्म और भक्ति पर अपनी शिक्षा का उपसंहार करते हैं, तो वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त करने के लिए गतिविधि का त्याग आवश्यक नहीं। भगवान का आश्रय लेते हुए समस्त कर्मों को करते रहकर, भक्त उनकी कृपा से शाश्वत, अविनाशी पद को प्राप्त करता है।
Frequently Asked Questions
भगवद्गीता 18.56 क्या सिखाती है?▼
यह सिखाती है कि जो भगवान का पूर्ण आश्रय लेता है, वह सदा समस्त कर्मों में संलग्न रहकर भी, भगवान की कृपा से शाश्वत और अविनाशी पद को प्राप्त कर लेता है। मुक्ति के लिए कर्म का त्याग आवश्यक नहीं, केवल भगवान का आश्रय लेना आवश्यक है।
'मद्व्यपाश्रयः' का क्या अर्थ है?▼
'मद्व्यपाश्रयः' का अर्थ है 'मेरा पूर्ण आश्रय लेने वाला'। श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि रहस्य समस्त गतिविधि का त्याग करना नहीं, अपितु प्रत्येक कर्म को भगवान पर पूर्ण निर्भरता एवं शरणागति के साथ करना है।
इस श्लोक के अनुसार एक व्यस्त व्यक्ति मुक्ति कैसे प्राप्त कर सकता है?▼
समस्त कर्तव्यों को भगवान का आश्रय लेते हुए करके और फलों को उन्हें समर्पित करके। यह श्लोक आश्वासन देता है कि भक्ति और शरणागति में जिया गया पूर्ण सक्रिय जीवन भी, भगवान की कृपा से शाश्वत पद की ओर ले जाता है — जिससे मुक्ति सबके लिए सुलभ हो जाती है।
यह श्लोक कर्मयोग से कैसे सम्बन्धित है?▼
यह कर्मयोग और भक्ति के संयोग का एक प्रमुख कथन है। यह दर्शाता है कि भगवान का आश्रय लेकर किया गया निःस्वार्थ कर्म स्वयं मुक्ति का मार्ग है, जो सांसारिक संलग्नता को सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्ष्य के साथ समन्वित करता है।
Ready to start chanting?
See Benefits & How to Chant →