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श्रीमद्भगवद्गीता २.७ — कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता २.७ — कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

कार्पण्यदोष
kārpaṇya-doṣha
कायरता का दोष / दीनता
उपहत
upahata
अभिभूत, ग्रस्त
स्वभावः
sva-bhāvaḥ
स्वभाव
पृच्छामि
pṛichchhāmi
मैं पूछता हूँ
त्वाम्
tvām
आपसे
धर्म
dharma
कर्तव्य, धर्म
संमूढ
sammūḍha
मोहित, भ्रमित
चेताः
chetāḥ
हृदय में
यत्
yat
जो
श्रेयः
śhreyaḥ
श्रेयस्कर, सर्वाधिक हितकारी
स्यात्
syāt
हो सकता है
निश्चितम्
niśhchitam
निश्चयपूर्वक
ब्रूहि
brūhi
कहिए
तत्
tat
वह
मे
me
मुझे
शिष्यः
śhiṣhyaḥ
शिष्य
ते
te
आपका
अहम्
aham
मैं
शाधि
śhādhi
उपदेश दीजिए
माम्
mām
मुझे
त्वाम्
tvām
आपकी
प्रपन्नम्
prapannam
शरणागत

Complete Translation

करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 7

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

दूसरे अध्याय सांख्ययोग में अर्जुन का शोक चरम पर पहुँच जाता है। युद्ध से इनकार कर विषाद में डूबे अर्जुन अन्ततः यह समझते हैं कि वे अपने संकट को अकेले हल नहीं कर सकते। इस श्लोक में वे शिष्य भाव से श्रीकृष्ण की पूर्ण शरण में आ जाते हैं और स्पष्ट मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं, जिससे श्रीकृष्ण गीता का केन्द्रीय उपदेश आरम्भ करते हैं।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 2.7 को मोड़ क्यों माना जाता है?
इस श्लोक में अर्जुन तर्क करना बंद कर देते हैं और शरण में आ जाते हैं। वे अपनी दुर्बलता स्वीकार करते हैं, स्वयं को श्रीकृष्ण का शिष्य घोषित करते हैं, और उपदेश माँगते हैं। यही विनम्र शरणागति का कार्य संवाद को अर्जुन के विलाप से गीता के दिव्य उपदेश में बदल देता है।
'कार्पण्य-दोष' का क्या अर्थ है?
'कार्पण्य-दोष' का अर्थ है कायरता या दीनतापूर्ण दुर्बलता का दोष — एक तुच्छ, असहाय मनोदशा। अर्जुन स्वीकार करते हैं कि उनका वास्तविक स्वभाव इस दुर्बलता से अभिभूत हो गया है, इसी कारण वे अपने कर्तव्य के विषय में स्पष्ट नहीं सोच पाते।
श्रेयस और प्रेयस में क्या अंतर है?
श्रेयस वह है जो अंततः अच्छा और हितकारी है, भले ही कठिन हो; प्रेयस वह है जो केवल प्रिय या सुखद है। अर्जुन विशेष रूप से श्रेयस माँगते हैं — जो उनके लिए वास्तव में अच्छा है — जो उनकी उच्च मार्गदर्शन ग्रहण करने की तत्परता दर्शाता है।
यह श्लोक दैनिक जीवन में कैसे सहायक है?
यह सिखाता है कि सच्चा मार्गदर्शन तब मिलता है जब हम अहंकार त्यागकर किसी गुरु या भगवान के पास विनम्रता से जाते हैं। उलझन में सच्चे मन से शरण लेकर और जो वास्तव में हितकारी है वही माँगकर — अपनी ही जिद पर अड़े रहने के बजाय — स्पष्टता का मार्ग खुलता है।

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