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श्रीमद्भगवद्गीता ४.९ — जन्म कर्म च मे दिव्यम् — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ४.९ — जन्म कर्म च मे दिव्यम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

जन्म
janma
जन्म
कर्म
karma
कर्म, कर्म-व्यवहार
cha
और
मे
me
मेरा
दिव्यम्
divyam
दिव्य, अलौकिक
एवम्
evam
इस प्रकार, ऐसे
यः
yaḥ
जो
वेत्ति
vetti
जानता है
तत्त्वतः
tattvataḥ
तत्त्व से, यथार्थ रूप में
त्यक्त्वा
tyaktvā
त्यागकर, छोड़कर
देहम्
deham
शरीर को
पुनः
punaḥ
फिर, पुनः
जन्म
janma
जन्म
न एति
na eti
नहीं प्राप्त होता
माम्
mām
मुझको
एति
eti
प्राप्त होता है, आता है
सः
saḥ
वह
अर्जुन
arjuna
हे अर्जुन

Complete Translation

हे अर्जुन! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है — इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वतः जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता; वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 4, Verse 9

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

चौथे अध्याय ज्ञान-कर्म-संन्यास योग में श्रीकृष्ण युगों-युगों में धर्म की रक्षा हेतु अपने दिव्य अवतरणों का रहस्य प्रकट करते हैं। यह घोषित करके कि वे धर्म की स्थापना के लिए युग-युग में प्रकट होते हैं, वे अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि जो उनके जन्म और कर्मों के अलौकिक स्वरूप को समझ लेते हैं, वे पुनर्जन्म से मुक्त होकर साक्षात् उन्हें ही प्राप्त करते हैं।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता ४.९ का मुख्य उपदेश क्या है?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि उनका जन्म और कर्म दिव्य एवं अलौकिक हैं, साधारण या प्राकृत नहीं। जो भगवान के अवतार के इस रहस्य को तत्त्वतः जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है — शरीर त्यागने पर ऐसा पुरुष पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु साक्षात् श्रीकृष्ण को प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण के जन्म और कर्म को 'दिव्य' क्यों कहा गया है?
सामान्य प्राणी कर्म के बन्धन के वशीभूत होकर जन्म लेते हैं, परन्तु श्रीकृष्ण अपनी ही इच्छा और दिव्य शक्ति (योगमाया) से धर्म की रक्षा हेतु अवतरित होते हैं। उनका शरीर प्राकृत नहीं है और उनके कर्म कोई बन्धनकारी कर्म उत्पन्न नहीं करते — इसीलिए वे 'दिव्यम्', पूर्णतः अलौकिक हैं।
इस श्लोक का ज्ञान मोक्ष की ओर कैसे ले जाता है?
भगवान के दिव्य स्वरूप को तत्त्वतः जानना हृदय को प्राकृत तादात्म्य से शुद्ध करता है और मन को भगवान में स्थिर कर देता है। भक्ति और ज्ञान से उत्पन्न ऐसा ज्ञान पुनर्जन्म के कारणों को विलीन कर देता है, जिससे शरीर त्यागने पर भक्त भगवान को प्राप्त करता है और फिर जन्म नहीं लेता।
यह श्लोक विशेषतः कब पढ़ा जाता है?
श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव जन्माष्टमी पर तथा भगवान श्रीकृष्ण की दैनिक उपासना में यह श्लोक प्रिय है। यह उनके प्राकट्य की दिव्यता को सीधे प्रतिपादित करता है, अतः भगवान के अवतार के चिन्तन और स्तवन के लिए यह एक प्रिय श्लोक है।

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