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श्रीमद्भगवद्गीता ७.१४ — दैवी ह्येषा गुणमयी — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ७.१४ — दैवी ह्येषा गुणमयी

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

दैवी
daivī
दैवी
हि
hi
निश्चय ही, क्योंकि
एषा
eṣhā
यह
गुण-मयी
guṇa-mayī
तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) से बनी हुई
मम
mama
मेरी
माया
māyā
दैवी माया, मोहित करने वाली शक्ति
दुरत्यया
duratyayā
अत्यन्त कठिन, पार करना दुष्कर
माम्
mām
मेरी ओर
एव
eva
ही, निश्चय ही
ये
ye
जो
प्रपद्यन्ते
prapadyante
शरण लेते हैं, शरणागत होते हैं
मायाम् एताम्
māyām etām
इस माया को
तरन्ति
taranti
पार कर जाते हैं, लाँघ जाते हैं
ते
te
वे

Complete Translation

यह दैवी, त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो पुरुष केवल मेरी ही शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 7, Verse 14

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

सातवें अध्याय ज्ञान-विज्ञान योग में श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप और शक्तियों का ज्ञान प्रकट करते हैं। यह बताते हुए कि अधिकांश लोग उन्हें क्यों नहीं पहचानते, वे प्रकट करते हैं कि तीन गुणों से बुनी उनकी माया संसार को मोहित करती है और इसे पार करना अत्यन्त कठिन है — फिर भी वे अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि जो केवल उनकी शरण लेते हैं वे इस माया के पार सकुशल ले जाए जाते हैं।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता ७.१४ की मुख्य शिक्षा क्या है?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि उनकी दैवी माया, जो प्रकृति के तीन गुणों से बनी है, पार करना अत्यन्त कठिन है। उसे पार करने का एक निश्चित मार्ग है केवल उनकी शरण में आना; जो केवल उनकी शरण लेते हैं वे माया को सकुशल पार कर जाते हैं।
इस श्लोक में 'माया' क्या है?
माया भगवान की अपनी दैवी शक्ति है जो उनके सच्चे स्वरूप को ढक देती है और आत्माओं को भौतिक अस्तित्व से तादात्म्य करने के मोह में डाल देती है। तीन गुणों — सत्त्व, रजस् और तमस् — से बनी होने के कारण वह 'दुरत्यया' है, अपने बल से पार करना प्रायः असम्भव।
माया को कैसे पार किया जा सकता है?
केवल व्यक्तिगत प्रयत्न के बल से नहीं, अपितु भगवान के प्रति पूर्ण हृदय से शरणागति के द्वारा। श्लोक कहता है कि जो कृष्ण की ही (माम् एव) शरण लेते हैं वे माया को पार कर जाते हैं। भक्ति और शरणागति उस कृपा को आमन्त्रित करती हैं जो आत्मा को माया के बन्धन से ऊपर उठाती है।
यह श्लोक भक्तों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह गीता के सबसे स्पष्ट आश्वासनों में से एक है कि भगवान की शरणागति मुक्ति का मार्ग है। यद्यपि यह ईमानदारी से स्वीकार करता है कि माया कितनी शक्तिशाली है, यह यह वचन देकर सारी निराशा दूर कर देता है कि भगवान की शरण उसके पार जाने की गारंटी है।

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