श्रीमद्भगवद्गीता ७.१४ — दैवी ह्येषा गुणमयी
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✦ अर्थ
ज्ञान-विज्ञान योग अध्याय के इस महत्त्वपूर्ण श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जीव बन्धन में क्यों रहते हैं — तीन गुणों से बुनी हुई उनकी दैवी मायाशक्ति को अपने प्रयत्न से पार करना प्रायः असम्भव है। फिर भी वे निश्चित उपाय बताते हैं — जो केवल उनकी ही शरण लेते हैं, वे माया को सकुशल पार कर जाते हैं। यह श्लोक माया की सामर्थ्य के गम्भीर सत्य को शरणागति के द्वारा कृपा के मुक्तिदायक आश्वासन के साथ जोड़ता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 7, Verse 14 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
सातवें अध्याय ज्ञान-विज्ञान योग में श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप और शक्तियों का ज्ञान प्रकट करते हैं। यह बताते हुए कि अधिकांश लोग उन्हें क्यों नहीं पहचानते, वे प्रकट करते हैं कि तीन गुणों से बुनी उनकी माया संसार को मोहित करती है और इसे पार करना अत्यन्त कठिन है — फिर भी वे अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि जो केवल उनकी शरण लेते हैं वे इस माया के पार सकुशल ले जाए जाते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
युगों से भक्तों ने इस श्लोक का आवाहन तब किया है जब वे सांसारिक जीवन की उलझनों से अभिभूत हुए, और परम्परा मानती है कि जहाँ भी कोई आत्मा सच्चे रूप में भगवान की शरण लेती है, माया का अन्यथा अलंघ्य पर्दा खुल जाता है — असंख्य संत साक्षी हैं कि भगवान की शरण ने उन्हें उस माया के पार पहुँचाया जिसे कोई व्यक्तिगत प्रयत्न नहीं जीत सका।
मंत्र
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दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
daivī hyeṣhā guṇa-mayī mama māyā duratyayā mām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te
अर्थ:यह दैवी, त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो पुरुष केवल मेरी ही शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ७.१४ — दैवी ह्येषा गुणमयी पाठ के लाभ
माया को समस्त जीवों को बाँधने वाली दैवी मायाशक्ति के रूप में प्रकट करता है
भगवान की शरण को माया पार करने का निश्चित साधन बताता है
भगवान में पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति) की प्रेरणा देता है
साधक को प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठने में सहायता करता है
यह विश्वास देता है कि कृपा, न कि केवल प्रयत्न, मुक्ति देती है
भक्ति को स्थिर करता है और मोह तथा आसक्ति से रक्षा करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ७.१४ — दैवी ह्येषा गुणमयी जप विधि
इस श्लोक का जप हृदय से शरणागति के साथ करें, यह स्वीकार करते हुए कि प्रकृति की माया को केवल अहंकार से नहीं जीता जा सकता, और भगवान की शरण लें जो भक्त को पार ले जाते हैं। भक्ति के साथ नियमित रूप से उच्चारित किए जाने पर यह दैवी कृपा पर निर्भरता को गहरा करता है और माया के खिंचाव के विरुद्ध मन को स्थिर करता है।
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