श्रीमद्भगवद्गीता ७.८ — रसोऽहमप्सु कौन्तेय
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✦ अर्थ
ज्ञान और विज्ञान वाले अध्याय के इस तेजस्वी श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि में अपनी सर्वव्यापी उपस्थिति प्रकट करते हैं। वे ही वस्तुओं का सार हैं — जल में रस, सूर्य और चन्द्र में प्रकाश, वेदों में पवित्र ॐकार, आकाश में शब्द, और प्रत्येक मनुष्य में सामर्थ्य। प्रत्येक उदाहरण भक्त को सिखाता है कि ईश्वर दूर नहीं, अपितु प्रत्येक अनुभव का आंतरिक सार है। यह दिव्य की सर्वव्यापकता पर एक सुंदर ध्यान है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 7, Verse 8 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
सातवें अध्याय, ज्ञान-विज्ञान योग में, श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन आरम्भ करते हैं, यह दर्शाते हुए कि एक परमात्मा किस प्रकार समस्त सृष्टि में व्याप्त है। यह श्लोक उस प्रकटीकरण का आरम्भ करता है, जिसमें वे स्वयं को जल, प्रकाश, वेद, आकाश और मनुष्य का सार बताते हैं, ताकि अर्जुन उन्हें सर्वत्र पहचानना सीख सके।
✦ शास्त्रों में वर्णित
जिन भक्तों ने इस श्लोक के उपदेश को आत्मसात किया, वे जगत् के रूपान्तरित दर्शन का वर्णन करते हैं, जिसमें जल का रस, चन्द्रमा की आभा और ॐ की ध्वनि सभी ईश्वर की निकटता के जीवन्त स्मारक बन गए, और उनके दैनिक जीवन को दिव्य की निरन्तर, आनन्दमय स्मृति से भर दिया।
मंत्र
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रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
raso ’ham apsu kaunteya prabhāsmi śhaśhi-sūryayoḥ praṇavaḥ sarva-vedeṣhu śhabdaḥ khe pauruṣhaṁ nṛiṣhu
अर्थ:हे कौन्तेय! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐकार) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और मनुष्यों में पुरुषत्व (सामर्थ्य) हूँ।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ७.८ — रसोऽहमप्सु कौन्तेय पाठ के लाभ
भक्त को अपने चारों ओर हर वस्तु में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करना सिखाता है
दिव्य को प्रत्येक अनुभव का सार प्रकट करके भक्ति को गहरा करता है
साधारण दैनिक जीवन में पवित्रता का निरन्तर भाव लाता है
ॐ (प्रणव) के जप को भगवान के स्वरूप के रूप में सुदृढ़ करता है
साधक और ईश्वर के बीच पृथकता के भाव को मिटाता है
सृष्टि के प्रति विस्मय, कृतज्ञता और श्रद्धा का विकास करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ७.८ — रसोऽहमप्सु कौन्तेय जप विधि
इस श्लोक को धीरे-धीरे जपें, प्रत्येक प्रतिमा पर रुककर अनुभव करें — जल का रस, सूर्य और चन्द्र का प्रकाश, ॐ की ध्वनि, अपने भीतर की शक्ति — दिव्य की जीवन्त उपस्थिति के रूप में। यह दैनिक अनुभव में ईश्वर-जागरूकता विकसित करने हेतु एक अद्भुत चिन्तन है। प्रत्येक आवृत्ति आपके नेत्रों और हृदय को समस्त वस्तुओं में एक ही प्रभु की झलक देखने का प्रशिक्षण दे।
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