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श्रीमद्भगवद्गीता ९.११ — अवजानन्ति मां मूढा — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ९.११ — अवजानन्ति मां मूढा

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अवजानन्ति
avajānanti
अनादर करते हैं, उपहास करते हैं, तुच्छ समझते हैं
माम्
mām
मुझे
मूढाः
mūḍhāḥ
मूढ़, मोहग्रस्त लोग
मानुषीम्
mānuṣhīm
मनुष्य
तनुम्
tanum
रूप, शरीर
आश्रितम्
āśhritam
धारण किया हुआ
परम्
param
परम, उच्चतर, दिव्य
भावम्
bhāvam
स्वरूप, भाव
अजानन्तः
ajānantaḥ
न जानते हुए
मम
mama
मेरे
भूत-महेश्वरम्
bhūta-maheśhvaram
समस्त प्राणियों के परम ईश्वर

Complete Translation

समस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 9, Verse 11

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

नवें अध्याय राज-विद्या योग में श्रीकृष्ण भक्ति का सर्वाधिक गोपनीय और सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करते हैं। यह प्रकट करने के बाद कि समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं जबकि वे अलौकिक बने रहते हैं, वे करुणापूर्वक देखते हैं कि मोहग्रस्त जन, केवल उनके मनुष्य रूप को देखकर, उनका उपहास करते हैं — समस्त प्राणियों के ईश्वर रूप उनके परम स्वरूप से अनजान।

Frequently Asked Questions

श्रीमद्भगवद्गीता ९.११ का मुख्य उपदेश क्या है?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि मूढ़, मोहग्रस्त लोग उनका अनादर करते हैं क्योंकि वे मनुष्य रूप में प्रकट होते हैं। वे उनके उच्चतर, अलौकिक स्वरूप को — समस्त प्राणियों के परम ईश्वर रूप को — नहीं पहचान पाते। यह श्लोक बाह्य रूप से दिव्य को आँकने के प्रति सचेत करता है।
लोग श्रीकृष्ण की दिव्यता को क्यों नहीं पहचान पाते?
क्योंकि वे केवल दृश्य मनुष्य शरीर को देखते हैं, उसके पीछे के 'परम भाव' — परम स्वरूप — को नहीं। आध्यात्मिक दृष्टि और श्रद्धा के अभाव में मूढ़ जन भगवान को एक साधारण व्यक्ति समझ बैठते हैं और इस प्रकार उनका अनादर करते हैं, उनके भूत-महेश्वर रूप वास्तविकता को चूक जाते हैं।
'भूत-महेश्वर' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है समस्त प्राणियों (भूत) के महान ईश्वर (महेश्वर)। मनुष्य रूप में प्रकट होते हुए भी श्रीकृष्ण समस्त अस्तित्व के परम नियन्ता और मूल हैं। यह श्लोक इसी छिपे, उच्चतर स्वरूप पर बल देता है जिसे मूढ़ जन चूक जाते हैं।
इस श्लोक में आध्यात्मिक जीवन के लिए क्या शिक्षा है?
यह सिखाता है कि बाह्य रूपों से परे देखें और भगवान, शास्त्र तथा सन्तों के पास श्रद्धा और विनम्रता से जाएँ। आध्यात्मिक पहचान इन्द्रियों पर नहीं, अपितु अन्तर्दृष्टि और भक्ति पर निर्भर करती है; इनके बिना दिव्य की उपस्थिति भी चूकी जा सकती है।

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