श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 — महात्मानस्तु मां पार्थ — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 — महात्मानस्तु मां पार्थ
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
महात्मानः
mahā-ātmānaḥ
महान् आत्माएँ, महात्मा जन
तु
tu
परन्तु
माम्
mām
मुझे
पार्थ
pārtha
हे पार्थ (अर्जुन), पृथा-पुत्र
दैवीं प्रकृतिम्
daivīm prakṛitim
दैवी प्रकृति/शक्ति
आश्रिताः
āśhritāḥ
आश्रय लेकर
भजन्ति
bhajanti
भजते हैं, उपासना करते हैं
अनन्यमनसः
ananya-manasaḥ
अनन्यमन से (केवल मुझमें स्थिर मन से)
ज्ञात्वा
jñātvā
जानकर
भूतादिम्
bhūta-ādim
समस्त सृष्टि का आदिकारण
अव्ययम्
avyayam
अव्यय, अविनाशी, अक्षय
Complete Translation
हे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 9, Verse 13
Author: Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa)
Period: Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
नवाँ अध्याय, जिसे परम गोपनीय ज्ञान (राजविद्या) कहा जाता है, श्रीकृष्ण के परम स्वरूप और उनकी भक्ति की महिमा को प्रकट करता है। यह वर्णन करके कि मूढ़ जन प्रभु का मानव रूप में उपहास करते हैं, श्रीकृष्ण स्नेहपूर्वक उन महात्माओं की ओर मुड़ते हैं जो उनकी सच्ची महानता को पहचानते हैं और अविभक्त हृदय से उनकी उपासना करते हैं। यह श्लोक गीता के महान् भक्त के परिभाषक चित्रों में से एक है।
Frequently Asked Questions
श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 के अनुसार महात्मा कौन है?▼
महात्मा (महान् आत्मा) वह है जो दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर, श्रीकृष्ण को समस्त भूतों का अविनाशी आदिकारण जानते हुए, अविचलित मन से उनकी उपासना करता है। यहाँ महानता ज्ञानयुक्त, अनन्य भक्ति से परिभाषित होती है।
अनन्य भक्ति क्या है?▼
अनन्य भक्ति 'अन्य रहित' भक्ति है — ऐसी उपासना जिसमें मन केवल दिव्य में स्थिर रहता है, अनेक कामनाओं के विषयों में विभाजित नहीं होता। यह श्लोक इसे महात्मा का लक्षण बताता है।
यह श्लोक ज्ञान और भक्ति को कैसे जोड़ता है?▼
महात्मा 'मुझे अविनाशी आदिकारण जानकर' (ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्) उपासना करते हैं। यहाँ सच्ची भक्ति ईश्वर के परम, शाश्वत स्वरूप के ज्ञान से प्रकाशित है — भक्ति और ज्ञान का संगम।
नवें अध्याय में इस श्लोक से पहले क्या आता है?▼
ठीक पहले, श्लोक 9.11 में, श्रीकृष्ण खेद व्यक्त करते हैं कि मूढ़ जन जब वे मानव रूप में प्रकट होते हैं तो उनका उपहास करते हैं, उनके परम स्वरूप को न जानकर। श्लोक 9.13 तब उन्हें उन महात्माओं से तुलना करता है जो उन्हें पहचानकर प्रेमपूर्वक भजते हैं।
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