श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 — महात्मानस्तु मां पार्थ
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✦ अर्थ
राजविद्या अध्याय में श्रीकृष्ण मूढ़ जनों के विपरीत महात्माओं का वर्णन करते हैं। दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर महात्मा अनन्य मन से उनकी आराधना करते हैं, उन्हें समस्त भूतों का अविनाशी आदिकारण जानकर। यह श्लोक ज्ञानयुक्त अनन्य भक्ति को सच्चे महात्मा का लक्षण बताता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 9, Verse 13 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
नवाँ अध्याय, जिसे परम गोपनीय ज्ञान (राजविद्या) कहा जाता है, श्रीकृष्ण के परम स्वरूप और उनकी भक्ति की महिमा को प्रकट करता है। यह वर्णन करके कि मूढ़ जन प्रभु का मानव रूप में उपहास करते हैं, श्रीकृष्ण स्नेहपूर्वक उन महात्माओं की ओर मुड़ते हैं जो उनकी सच्ची महानता को पहचानते हैं और अविभक्त हृदय से उनकी उपासना करते हैं। यह श्लोक गीता के महान् भक्त के परिभाषक चित्रों में से एक है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्ति परम्परा मानती है कि इस श्लोक में प्रशंसित महात्मा अपने अविभक्त प्रेम के कारण पूर्णतः प्रभु की रक्षा में आ जाते हैं; उनका उदाहरण असंख्य संतों को केवल अविनाशी दिव्य में मन स्थिर करने की प्रेरणा देता रहा है।
मंत्र
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महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥
mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam
अर्थ:हे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 — महात्मानस्तु मां पार्थ पाठ के लाभ
महात्मा — सच्चे महान् आत्मा — के गुणों का वर्णन करता है
दिव्य के प्रति अनन्य, एकाग्र भक्ति (अनन्य भक्ति) की प्रेरणा देता है
ईश्वर को अविनाशी आदिकारण जानने के ज्ञान को प्रेमपूर्ण उपासना के साथ जोड़ता है
दैवी प्रकृति में आश्रय लेने को प्रोत्साहित करता है
केवल प्रभु में स्थिर मन की दृढ़ता का विकास करता है
भक्ति और समर्पण को गहरा करने हेतु एक प्रिय श्लोक
श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 — महात्मानस्तु मां पार्थ जप विधि
इस श्लोक का भक्तिपूर्वक जप करें, श्रीकृष्ण को समस्त भूतों के अविनाशी आदिकारण (भूतादिम् अव्ययम्) के रूप में चिन्तन करते हुए। इसमें वर्णित 'अनन्य-मन' की आकांक्षा करें — ऐसा मन जो अन्य विषयों की ओर न भटके, अपितु प्रेमपूर्वक केवल प्रभु में स्थिर रहे। प्रत्येक आवृत्ति हृदय को एकनिष्ठ भक्ति की ओर खींचे।
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