भक्तामर स्तोत्र Meaning — Line by Line
भक्तामर स्तोत्र
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Bhaktamara-praṇata-mauli-maṇi-prabhāṇā-
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥
Bhaktamara-praṇata-mauli-maṇi-prabhāṇā- mudyotakaṁ dalita-pāpa-tamo-vitānam। Samyak praṇamya jina-pāda-yugaṁ yugādā- vālambanaṁ bhava-jale patatāṁ janānām॥
Meaningजो जिनेन्द्र के चरण-युगल नमस्कार करते हुए देवताओं के मुकुटों की मणियों की प्रभा को और उद्योतित करते हैं, पाप रूपी अन्धकार के समूह को नष्ट करते हैं, और युग के आरम्भ से ही संसार-सागर में डूबते प्राणियों के आलम्बन हैं — उन चरणों को भली-भाँति प्रणाम करके:
Yaḥ saṁstutaḥ sakala-vāṅmaya-tattva-bodhā-
यः संस्तुतः सकल-वाङ्मय-तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि-पटुभिः सुर-लोक-नाथैः। स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारैः स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥
Yaḥ saṁstutaḥ sakala-vāṅmaya-tattva-bodhā- dudbhūta-buddhi-paṭubhiḥ sura-loka-nāthaiḥ। Stotrairjagat-tritaya-chitta-harairudāraiḥ stoṣye kilāhamapi taṁ prathamaṁ jinendram॥
Meaningजिनकी स्तुति समस्त शास्त्रों के ज्ञान से उत्पन्न तीक्ष्ण बुद्धि वाले देवलोक के अधिपतियों (इन्द्रादि) ने तीनों लोकों के चित्त को हरने वाले उदार स्तोत्रों से की है — उन प्रथम जिनेन्द्र (ऋषभदेव) की स्तुति मैं भी करूँगा।
Buddhyā vināpi vibudhārchita-pāda-pīṭha!
बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ! स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्। बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम्॥
Buddhyā vināpi vibudhārchita-pāda-pīṭha! stotuṁ samudyata-matirvigata-trapo'ham। Bālaṁ vihāya jala-saṁsthita-mindu-bimba- manyaḥ ka ichchhati janaḥ sahasā grahītum॥
Meaningहे देवताओं द्वारा पूजित चरण-पीठ वाले प्रभु! बुद्धि के बिना भी, लज्जा त्यागकर मैं आपकी स्तुति करने को उद्यत हुआ हूँ। जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र-बिम्ब को बालक के सिवा कौन सहसा पकड़ना चाहेगा?
Vaktuṁ guṇān guṇa-samudra! śaśāṅka-kāntān
वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशाङ्क-कान्तान् कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या। कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं को वा तरीतुमलमम्बु-निधिं भुजाभ्याम्॥
Vaktuṁ guṇān guṇa-samudra! śaśāṅka-kāntān kaste kṣamaḥ sura-guru-pratimo'pi buddhyā। Kalpānta-kāla-pavanoddhata-nakra-chakraṁ ko vā tarītumalamambu-nidhiṁ bhujābhyām॥
Meaningहे गुणों के सागर! आपके चन्द्र-समान कान्तिमान गुणों का वर्णन करने में बृहस्पति के समान बुद्धि वाला भी कौन समर्थ है? प्रलयकाल की प्रचण्ड वायु से क्षुब्ध मगरों के समूह वाले समुद्र को भुजाओं से कौन तैर सकता है?
So'haṁ tathāpi tava bhakti-vaśānmunīśa!
सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश! कर्तुं स्तवं विगत-शक्तिरपि प्रवृत्तः। प्रीत्यात्म-वीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम्॥
So'haṁ tathāpi tava bhakti-vaśānmunīśa! kartuṁ stavaṁ vigata-śaktirapi pravṛttaḥ। Prītyātma-vīryamavichārya mṛgo mṛgendraṁ nābhyeti kiṁ nija-śiśoḥ paripālanārtham॥
Meaningफिर भी, हे मुनीश! भक्ति के वश होकर, शक्ति रहित होते हुए भी मैं आपकी स्तुति में प्रवृत्त हुआ हूँ। प्रेम से अपने बल का विचार न करके क्या हिरणी अपने शिशु की रक्षा के लिए सिंह के सामने नहीं आ जाती?
Oṁ hrīṁ śrīṁ ṛṣabhadevāya namaḥ॥
ॐ ह्रीं श्रीं ऋषभदेवाय नमः॥
Oṁ hrīṁ śrīṁ ṛṣabhadevāya namaḥ॥
Meaningॐ ह्रीं श्रीं ऋषभदेव को नमस्कार है।
Word-by-Word Breakdown
Origin & History
Source: Bhaktamara Stotra (Jain devotional literature)
Author: Acharya Manatunga
Period: c. 6th–7th century CE
महान जैन मुनि आचार्य मानतुंग ने प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की स्तुति-गान के रूप में भक्तामर स्तोत्र की रचना की। सर्वाधिक प्रसिद्ध किंवदन्ती के अनुसार, एक राजा ने उनकी भक्ति की शक्ति को चुनौती देने हेतु उन्हें बेड़ियों में बन्दी बना दिया। मानतुंग ने जिन की स्तुति में श्लोक पढ़ना आरम्भ किया, और प्रत्येक श्लोक के पूर्ण होते ही एक बेड़ी टूट गई, जब तक वे पूर्णतः मुक्त होकर आगे न बढ़ गए। तभी से यह स्तोत्र श्वेताम्बर एवं दिगम्बर दोनों परम्पराओं में रक्षा एवं मुक्ति का स्रोत माना जाता रहा है।
Frequently Asked Questions
भक्तामर स्तोत्र की रचना किसने की और यह किसे सम्बोधित है?▼
इसे 'भक्तामर' क्यों कहा जाता है?▼
इस स्तोत्र के पीछे की प्रसिद्ध कथा क्या है?▼
सम्पूर्ण भक्तामर स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?▼
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