भक्तामर स्तोत्र
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✦ अर्थ
भक्तामर स्तोत्र जैन परम्परा का सर्वाधिक पूज्य भक्ति-स्तोत्र है, जिसकी रचना आचार्य मानतुंग ने प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ (आदिनाथ) की स्तुति में की। वसन्ततिलका छंद में रचित इसके चौवालीस श्लोक भगवान के अनन्त गुणों और उनके नाम की रक्षक शक्ति का गुणगान करते हैं। मान्यता है कि मानतुंग ने इसे बेड़ियों में बँधे हुए रचा, और प्रत्येक श्लोक के साथ एक बेड़ी टूटती गई।
उत्पत्ति और कथा
Bhaktamara Stotra (Jain devotional literature) · Acharya Manatunga · c. 6th–7th century CE
महान जैन मुनि आचार्य मानतुंग ने प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की स्तुति-गान के रूप में भक्तामर स्तोत्र की रचना की। सर्वाधिक प्रसिद्ध किंवदन्ती के अनुसार, एक राजा ने उनकी भक्ति की शक्ति को चुनौती देने हेतु उन्हें बेड़ियों में बन्दी बना दिया। मानतुंग ने जिन की स्तुति में श्लोक पढ़ना आरम्भ किया, और प्रत्येक श्लोक के पूर्ण होते ही एक बेड़ी टूट गई, जब तक वे पूर्णतः मुक्त होकर आगे न बढ़ गए। तभी से यह स्तोत्र श्वेताम्बर एवं दिगम्बर दोनों परम्पराओं में रक्षा एवं मुक्ति का स्रोत माना जाता रहा है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा से माना जाता है कि आचार्य मानतुंग, जिन्हें जैन भक्ति पर सन्देह करने वाले एक राजा ने बेड़ियों में बाँधकर कारागार में डाल दिया था, ने भक्तामर स्तोत्र का श्लोक-दर-श्लोक पाठ किया — और प्रत्येक क्रमिक श्लोक के साथ उन्हें बाँधने वाली एक लोहे की बेड़ी टूटती गई, जब तक वे मुक्त होकर आगे न बढ़ गए, जो जिन के प्रति भक्ति की मुक्तिदायक शक्ति को दर्शाता है।
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भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥
Bhaktamara-praṇata-mauli-maṇi-prabhāṇā- mudyotakaṁ dalita-pāpa-tamo-vitānam। Samyak praṇamya jina-pāda-yugaṁ yugādā- vālambanaṁ bhava-jale patatāṁ janānām॥
अर्थ:जो जिनेन्द्र के चरण-युगल नमस्कार करते हुए देवताओं के मुकुटों की मणियों की प्रभा को और उद्योतित करते हैं, पाप रूपी अन्धकार के समूह को नष्ट करते हैं, और युग के आरम्भ से ही संसार-सागर में डूबते प्राणियों के आलम्बन हैं — उन चरणों को भली-भाँति प्रणाम करके:
यः संस्तुतः सकल-वाङ्मय-तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि-पटुभिः सुर-लोक-नाथैः। स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारैः स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥
Yaḥ saṁstutaḥ sakala-vāṅmaya-tattva-bodhā- dudbhūta-buddhi-paṭubhiḥ sura-loka-nāthaiḥ। Stotrairjagat-tritaya-chitta-harairudāraiḥ stoṣye kilāhamapi taṁ prathamaṁ jinendram॥
अर्थ:जिनकी स्तुति समस्त शास्त्रों के ज्ञान से उत्पन्न तीक्ष्ण बुद्धि वाले देवलोक के अधिपतियों (इन्द्रादि) ने तीनों लोकों के चित्त को हरने वाले उदार स्तोत्रों से की है — उन प्रथम जिनेन्द्र (ऋषभदेव) की स्तुति मैं भी करूँगा।
बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ! स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्। बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम्॥
Buddhyā vināpi vibudhārchita-pāda-pīṭha! stotuṁ samudyata-matirvigata-trapo'ham। Bālaṁ vihāya jala-saṁsthita-mindu-bimba- manyaḥ ka ichchhati janaḥ sahasā grahītum॥
अर्थ:हे देवताओं द्वारा पूजित चरण-पीठ वाले प्रभु! बुद्धि के बिना भी, लज्जा त्यागकर मैं आपकी स्तुति करने को उद्यत हुआ हूँ। जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र-बिम्ब को बालक के सिवा कौन सहसा पकड़ना चाहेगा?
वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशाङ्क-कान्तान् कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या। कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं को वा तरीतुमलमम्बु-निधिं भुजाभ्याम्॥
Vaktuṁ guṇān guṇa-samudra! śaśāṅka-kāntān kaste kṣamaḥ sura-guru-pratimo'pi buddhyā। Kalpānta-kāla-pavanoddhata-nakra-chakraṁ ko vā tarītumalamambu-nidhiṁ bhujābhyām॥
अर्थ:हे गुणों के सागर! आपके चन्द्र-समान कान्तिमान गुणों का वर्णन करने में बृहस्पति के समान बुद्धि वाला भी कौन समर्थ है? प्रलयकाल की प्रचण्ड वायु से क्षुब्ध मगरों के समूह वाले समुद्र को भुजाओं से कौन तैर सकता है?
सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश! कर्तुं स्तवं विगत-शक्तिरपि प्रवृत्तः। प्रीत्यात्म-वीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम्॥
So'haṁ tathāpi tava bhakti-vaśānmunīśa! kartuṁ stavaṁ vigata-śaktirapi pravṛttaḥ। Prītyātma-vīryamavichārya mṛgo mṛgendraṁ nābhyeti kiṁ nija-śiśoḥ paripālanārtham॥
अर्थ:फिर भी, हे मुनीश! भक्ति के वश होकर, शक्ति रहित होते हुए भी मैं आपकी स्तुति में प्रवृत्त हुआ हूँ। प्रेम से अपने बल का विचार न करके क्या हिरणी अपने शिशु की रक्षा के लिए सिंह के सामने नहीं आ जाती?
ॐ ह्रीं श्रीं ऋषभदेवाय नमः॥
Oṁ hrīṁ śrīṁ ṛṣabhadevāya namaḥ॥
अर्थ:ॐ ह्रीं श्रीं ऋषभदेव को नमस्कार है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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भक्तामर स्तोत्र पाठ के लाभ
प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की कृपा एवं रक्षा का आह्वान करता है।
परम्परा से भय, बन्धन, कारावास एवं विघ्नों को दूर करने वाला माना जाता है।
जिन के प्रति गहन भक्ति एवं विनम्रता को विकसित करता है।
इसका पाठ कष्ट, रोग एवं दुर्भाग्य को दूर करने वाला कहा जाता है।
मन को शान्त करता है तथा आन्तरिक शान्ति एवं श्रद्धा की दृढ़ता लाता है।
एक प्रबुद्ध आत्मा के गुणों पर एक पूर्ण काव्यमय ध्यान।
भक्तामर स्तोत्र जप विधि
शान्त, पवित्र मन एवं सच्ची भक्ति के साथ पाठ करें, यथासम्भव आदिनाथ की प्रतिमा के समक्ष बैठकर। सम्पूर्ण स्तोत्र में 44 श्लोक हैं; अनेक भक्त प्रतिदिन सम्पूर्ण पाठ करते हैं, जबकि अन्य यहाँ दिए आरम्भिक श्लोकों से शुरू करते हैं। प्रवाहमयी वसन्ततिलका छंद में प्रत्येक शब्द को स्पष्ट उच्चारित करें। ऋषभदेव को बीज-मन्त्र नमस्कार के साथ समाप्त करें। स्वच्छता, अहिंसा एवं शाकाहारी अनुशासन बनाए रखना साधना को सबल करता है।