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ॐ मणि पद्मे हूं

🕉️ buddhist·📿 108× जप·🕐 किसी भी समय — परंपरागत रूप से पूरे दिन निरंतर जपा जाता है·🎵 ऑडियो सहित·📜 Karandavyuha Sutra

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अर्थ

ॐ मणि पद्मे हूं तिब्बती बौद्ध धर्म का सबसे प्रसिद्ध मंत्र है, जो करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का मंत्र है। इसके छह अक्षर छह नकारात्मक भावों का शोधन और छह पारमिताओं का विकास करते हैं; इसका सार है 'कमल में मणि' — हृदय रूपी कमल में बोधि रूपी रत्न।

उत्पत्ति और कथा

Karandavyuha Sutra · Revealed by Buddha Shakyamuni · 4th-5th century CE (sutra composition)

करण्डव्यूह सूत्र के अनुसार, बुद्ध ने इस मंत्र को समस्त करुणा के सार के रूप में सिखाया। यह अवलोकितेश्वर का मंत्र है, वह बोधिसत्व जिसने यह व्रत लिया कि जब तक प्रत्येक सचेतन प्राणी दुःख से मुक्त न हो जाए तब तक वे विश्राम नहीं करेंगे। जब अनंत दुःख देखने की पीड़ा से उनका सिर फट गया, तब बुद्ध अमिताभ ने उन्हें समस्त प्राणियों को देखने के लिए ग्यारह सिर और सभी की सहायता के लिए सहस्र भुजाएँ प्रदान कीं। 7वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म के आगमन के बाद यह मंत्र तिब्बत में सर्वाधिक जपा जाने वाला बन गया।

शास्त्रों में वर्णित

करण्डव्यूह सूत्र अभिलेखित करता है कि जो कीट और पशु भी इस मंत्र को सुनते हैं वे निम्न लोकों से मुक्त हो जाते हैं। तिब्बत में, यह पूरे भूदृश्य में पत्थरों (मणि पत्थरों) पर उत्कीर्ण है — उनमें से लाखों — ताकि जो वायु उनके ऊपर से गुज़रे वह भी मंत्र का आशीर्वाद समस्त प्राणियों तक ले जाए। दलाई लामा ने कहा है कि सदियों से इस मंत्र द्वारा उत्पन्न संचित करुणा ने तिब्बती सभ्यता के शांतिपूर्ण स्वभाव को आकार दिया है।

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मंत्र

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मणि पद्मे हूं

Om Ma-ni Pad-me Hum

अर्थ:'ॐ मणि पद्मे हूं' — इसका सरल शब्दानुवाद सम्भव नहीं; इसका सार है 'कमल में मणि' — अर्थात् अवलोकितेश्वर की करुणा एवं प्रज्ञा; समस्त प्राणियों के प्रति करुणा और बोधि की कामना इसमें निहित है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

🔊Omपवित्र अक्षर — साधक के अशुद्ध शरीर, वाणी और मन का, तथा बुद्ध के शुद्ध शरीर, वाणी और मन का प्रतीक
मणि🔊Maniरत्न — करुणा, प्रेम, और सभी प्राणियों के कल्याण हेतु बुद्धत्व प्राप्त करने के परोपकारी संकल्प का प्रतीक
पद्मे🔊Padmeकमल — प्रज्ञा का प्रतीक, अनित्यता और शून्यता का बोध, जो आसक्ति के कीचड़ से शुद्ध होकर खिलता है
हूं🔊Humअविभाज्यता — उपाय (करुणा) और प्रज्ञा का मिलन, जो केवल बुद्धि से नहीं बल्कि साधना से ही प्राप्त होता है
ॐ (purifies)🔊Omशरीर के आवरणों को शुद्ध करता है — अहंकार और दर्प
म (purifies)🔊Maवाणी के आवरणों को शुद्ध करता है — ईर्ष्या और मनोरंजन की लालसा
णि (purifies)🔊Niमन के आवरणों को शुद्ध करता है — राग और इच्छा
पद् (purifies)🔊Padविरोधी भावनाओं के आवरणों को शुद्ध करता है — अज्ञान और पूर्वाग्रह
मे (purifies)🔊Meअव्यक्त संस्कारों के आवरणों को शुद्ध करता है — दरिद्रता और परिग्रह
हूं (purifies)🔊Humद्वेष के आवरणों को शुद्ध करता है — आक्रामकता और घृणा

ॐ मणि पद्मे हूं पाठ के लाभ

समस्त सचेतन प्राणियों के प्रति सार्वभौमिक करुणा का विकास करता है

अनेक जन्मों में संचित नकारात्मक कर्म का शोधन करता है

मन को शांत करता है और चिंता, क्रोध तथा आसक्ति को कम करता है

छह में से प्रत्येक अक्षर चक्रीय अस्तित्व के छह लोकों में से एक का शोधन करता है

साधक को करुणा के बुद्ध अवलोकितेश्वर से जोड़ता है

विश्व में सर्वाधिक जपे जाने वाले मंत्रों में से एक — प्रतिदिन अरबों बार पाठ

ॐ मणि पद्मे हूं जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयकिसी भी समय — परंपरागत रूप से पूरे दिन निरंतर जपा जाता है

इस मंत्र का जप कोई भी, कहीं भी, किसी भी समय कर सकता है। 108 मनकों की माला का उपयोग करें। धीरे और स्पष्ट रूप से जप करें, समस्त प्राणियों के प्रति करुणा पर ध्यान केंद्रित करते हुए। तिब्बती बौद्ध अक्सर लाखों मुद्रित मंत्रों वाले प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए जप करते हैं। दलाई लामा कहते हैं: 'इस मंत्र का पाठ करना बहुत अच्छा है। जब आप इसे करें, तो इसके अर्थ का चिंतन करें, क्योंकि इसका अर्थ विशाल और गहन है।'

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका शाब्दिक अर्थ है 'कमल में मणि', परंतु इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है। छह अक्षर छह नकारात्मक भावों (अभिमान, ईर्ष्या, इच्छा, अज्ञान, लोभ, क्रोध) के शोधन और छह पारमिताओं (दान, शील, क्षमा, वीर्य, समाधि, प्रज्ञा) के विकास को दर्शाते हैं।
यह एक बौद्ध मंत्र है, विशेष रूप से तिब्बती बौद्ध धर्म (वज्रयान) से। यह करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर (तिब्बती में चेनरेज़िग) का मंत्र है। हालाँकि, यह सार्वभौमिक है और करुणा एवं शांति चाहने वाला कोई भी इसका जप कर सकता है।
कोई सीमा नहीं है। तिब्बती बौद्ध इसे निरंतर जपते हैं — कुछ एक जीवनकाल में करोड़ों बार पाठ संचित करते हैं। औपचारिक साधना के लिए 108 बार (एक माला) मानक है। यहाँ तक कि एक सच्चा पाठ भी लाभकारी है।
यह विश्व में सर्वाधिक जपा जाने वाला मंत्र है। दलाई लामा ने कहा है कि इसमें समस्त बौद्ध शिक्षाओं का सार समाहित है। इसके छह अक्षर करुणा और प्रज्ञा के माध्यम से दुःख से बोधि तक के संपूर्ण मार्ग को समेटते हैं।

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