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भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः — Word-by-Word Meaning

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

भवन्ति
bhavanti
भवन्ति — होते हैं, हो जाते हैं
नम्राः
namrāḥ
नम्राः — झुके हुए, विनम्र, नीचे की ओर झुकने वाले
तरवः
taravaḥ
तरवः — वृक्ष
फलोद्गमैः
phalodgamaiḥ
फलोद्गमैः — फलों के उद्गम / भार से
नवाम्बुभिः
navāmbubhiḥ
नवाम्बुभिः — नवीन (वर्षा के) जल से
भूमिविलम्बिनः
bhūmi-vilambinaḥ
भूमिविलम्बिनः — पृथ्वी की ओर झुके हुए
घनाः
ghanāḥ
घनाः — मेघ, बादल
अनुद्धताः
anuddhatāḥ
अनुद्धताः — अनुद्धत, अहंकाररहित, उद्धतता से रहित
सत्पुरुषाः
sat-puruṣāḥ
सत्पुरुषाः — सज्जन, श्रेष्ठ एवं सच्चरित्र पुरुष
समृद्धिभिः
samṛddhibhiḥ
समृद्धिभिः — समृद्धि से, ऐश्वर्य एवं वैभव से
स्वभावः
svabhāvaḥ
स्वभावः — सहज स्वभाव, स्वाभाविक प्रकृति
एव एषः
eva eṣaḥ
एव एषः — यही निश्चय ही (है)
परोपकारिणाम्
paropakāriṇām
परोपकारिणाम् — परोपकारियों का, दूसरों का हित करने वालों का

Complete Translation

वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं; नवीन जल से भरे हुए मेघ पृथ्वी की ओर झुककर नीचे आ जाते हैं; और सज्जन पुरुष समृद्धि पाकर भी अनुद्धत (अहंकाररहित) बने रहते हैं — क्योंकि यह विनम्रता ही परोपकारी जनों का सहज स्वभाव है। भर्तृहरि प्रकृति का दृष्टान्त देकर दिखाते हैं कि सच्ची महानता अहंकार से नहीं, बल्कि नम्रता से प्रकट होती है।

Origin & History

Source: Niti Shataka of Bhartrhari (Subhashita)

Author: Bhartrhari

Period: Classical Sanskrit literature (c. 5th century CE)

भर्तृहरि अपने नीतिशतक में सज्जन — सच्चे श्रेष्ठ पुरुष — के चरित्र की बार-बार प्रशंसा करते हैं। यहाँ वे अपने उपदेश के लिए प्रकृति की ओर मुड़ते हैं: फलों से भरा वृक्ष और जल धारण किए मेघ दोनों पृथ्वी की ओर विनम्रता से झुकते हैं। इन दृष्टान्तों से वे यह सिद्धान्त निकालते हैं कि परोपकारी जन जितने अधिक समृद्ध होते हैं, उतने ही अधिक विनम्र हो जाते हैं — इस प्रकार विनम्रता उदार आत्मा की पहचान बन जाती है।

Frequently Asked Questions

'भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं।' पूर्ण श्लोक फलों से लदे वृक्षों और जल से भरे मेघों की — जो दोनों पृथ्वी की ओर झुकते हैं — तुलना उन सज्जनों से करता है जो समृद्धि में भी विनम्र बने रहते हैं, यह दिखाते हुए कि विनम्रता परोपकारी जनों का सहज स्वभाव है।
इस श्लोक की रचना किसने की?
यह सुप्रसिद्ध संस्कृत कवि-दार्शनिक भर्तृहरि के नीतिशतक से है, जो नीति और सदाचार पर उनके सौ श्लोकों का संग्रह है।
यह सुभाषित कौन-सा जीवन-पाठ सिखाता है?
कि सच्ची महानता और समृद्धि मनुष्य को अधिक विनम्र और उदार बनाए, अधिक अहंकारी नहीं। प्रकृति स्वयं इसका आदर्श है: समृद्धि वृक्ष और मेघ को नीचे झुका देती है, वैसे ही वह सज्जन को कोमल और अनुद्धत बनाती है।

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