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भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या (देवी की भृकुटि से काली का प्रादुर्भाव) — Word-by-Word Meaning

भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या (देवी की भृकुटि से काली का प्रादुर्भाव)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

भ्रुकुटीकुटिलात्
bhrukuṭī-kuṭilāt
टेढ़ी, तनी हुई भृकुटि से
तस्याः ललाटफलकात्
tasyāḥ lalāṭa-phalakāt
उनके ललाट-पटल से
द्रुतम्
drutam
सहसा, शीघ्र
काली करालवदना
kālī karāla-vadanā
काली, विकराल मुख वाली
विनिष्क्रान्ता असिपाशिनी
viniṣkrāntā asi-pāśinī
खड्ग और पाश लिए प्रकट हुईं
विचित्रखट्वाङ्गधरा
vicitra-khaṭvāṅga-dharā
विचित्र खट्वांग (मुण्ड-शीर्ष दण्ड) धारिणी
नरमालाविभूषणा
nara-mālā-vibhūṣaṇā
नर-मुण्डों की माला से विभूषित
द्वीपिचर्मपरीधाना
dvīpi-carma-parīdhānā
बाघ-चर्म पहने हुए
शुष्कमांसातिभैरवा
śuṣka-māṃsāti-bhairavā
सूखे मांस से अत्यन्त भयंकर
अतिविस्तारवदना
ati-vistāra-vadanā
अत्यन्त फैले मुख वाली
जिह्वाललनभीषणा
jihvā-lalana-bhīṣaṇā
लपलपाती जीभ से भयानक
निमग्नारक्तनयना
nimagnā-rakta-nayanā
गहरे धँसे लाल नेत्र वाली
नादापूरितदिङ्मुखा
nādāpūrita-diṅmukhā
अपनी गर्जना से दिशाओं को भरने वाली

Complete Translation

उनके भौंहों से टेढ़े हुए ललाट-पटल से सहसा काली प्रकट हुईं, जो विकराल मुख वाली, खड्ग और पाश धारण किए हुए, विचित्र खट्वांग लिए, नर-मुण्डों की माला से विभूषित, बाघ-चर्म पहने, सूखे मांस से अत्यन्त भयंकर थीं; जिनका मुख अत्यन्त फैला हुआ, लपलपाती जीभ से भयानक, गहरे लाल नेत्र वाला, और जिनकी गर्जना से दिशाएँ भर गई थीं।

Origin & History

Source: Durga Saptashati Chapter 7

Author: Sage Markandeya (Markandeya Purana)

Period: c. 400–600 CE (Markandeya Purana)

दैत्यराज शुम्भ ने अपने सेनापति चण्ड और मुण्ड को चतुरंगिणी सेना के साथ देवी को पकड़ने भेजा। जैसे ही वे उन्हें बन्दी बनाने आगे बढ़े, अम्बिका का मुख क्रोध से काला पड़ गया, और उनके ललाट की टेढ़ी भृकुटि से उग्र देवी काली खड्ग और पाश लिए प्रकट हुईं। काली ने दैत्य-सेनाओं को निगल लिया और चण्ड व मुण्ड के सिर काट दिए, जिसके कारण देवी ने उन्हें 'चामुण्डा' नाम दिया।

Frequently Asked Questions

इन श्लोकों के अनुसार देवी काली का प्रादुर्भाव कैसे हुआ?
जब चण्ड और मुण्ड दैत्यों ने आक्रमण किया, तब अम्बिका अत्यन्त क्रुद्ध हो गईं और उनका मुख स्याही-सा काला पड़ गया। उनकी टेढ़ी, तनी हुई भृकुटि से काली सहसा प्रकट हुईं — विकराल मुख वाली, खड्ग, पाश और मुण्ड-दण्ड लिए — दैत्य-सेनाओं का संहार करने हेतु।
काली का स्वरूप इतना भयंकर क्यों दिखाया जाता है?
काली की मुण्डमाला, बाघ-चर्म, लपलपाती जीभ और धँसे लाल नेत्र उस सर्वग्रासी शक्ति का प्रतीक हैं जो बुराई का नाश करती है और काल को भी ग्रस लेती है। उनका उग्र रूप रक्षक है: यह दुष्टों को भयभीत करता है और भक्त की रक्षा करता है।
यह दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय से है?
ये दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय (चण्ड-मुण्ड-वध) के 5 से 7 श्लोक हैं, जो देवी महासरस्वती के अधिष्ठित उत्तम चरित का अंग है।

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