ब्रह्मानन्दं परमसुखदं (गुरु / दक्षिणामूर्ति ध्यान) — Word-by-Word Meaning
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं (गुरु / दक्षिणामूर्ति ध्यान)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
Complete Translation
Origin & History
Source: Traditional Guru-stotra / Dakshinamurti dhyana shloka (Advaita Vedanta tradition)
Author: Unknown (traditional; widely used in Vedantic and monastic lineages)
Period: Classical / medieval
यह एकल ध्यान श्लोक अद्वैत तथा व्यापक सनातन परम्परा में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली गुरु-वन्दनाओं में से एक है। यह दक्षिणामूर्ति से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है — शिव का वह स्वरूप जो वटवृक्ष के नीचे विराजमान हैं और जिन्होंने अपने मौन मात्र से उन वृद्ध ऋषियों के संशय दूर कर दिए जो शिष्य बनकर उनके पास आए थे। यह श्लोक गुरु की समस्त वेदान्तिक दृष्टि को संक्षिप्त कर देता है: गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो ब्रह्म के साथ अभिन्न है, समस्त मनों की साक्षी, द्वन्द्वों एवं गुणों से परे।
Frequently Asked Questions
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं में किसकी वन्दना की गई है?▼
यह श्लोक अध्ययन या ध्यान से पहले क्यों पढ़ा जाता है?▼
'तत्त्वमस्यादि लक्ष्यम्' का क्या अर्थ है?▼
क्या यह श्लोक केवल उन्हीं के लिए है जिनके पास जीवित गुरु हैं?▼
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