ब्रह्मानन्दं परमसुखदं (गुरु / दक्षिणामूर्ति ध्यान)
अन्य नाम / खोज: brahmanandam parama sukhadam · brahmananda parama sukhada · sadgurum tam namami · guru dhyana shloka · dakshinamurti dhyana shloka
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✦ अर्थ
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं सबसे प्रिय गुरु-वन्दना श्लोक है, जिसे सद्गुरु तथा भगवान दक्षिणामूर्ति (शिव के मौन-गुरु स्वरूप) की कृपा प्राप्त करने हेतु पारंपरिक रूप से पढ़ा जाता है। एक ही श्लोक में यह गुरु को निराकार ब्रह्म के समान — आनन्दमय, सर्वज्ञ, आकाशवत्, अद्वितीय, नित्य और त्रिगुणातीत — बताता है। इसे पाठ, ध्यान एवं वेदान्त अध्ययन के आरम्भ में पढ़ा जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Guru-stotra / Dakshinamurti dhyana shloka (Advaita Vedanta tradition) · Unknown (traditional; widely used in Vedantic and monastic lineages) · Classical / medieval
यह एकल ध्यान श्लोक अद्वैत तथा व्यापक सनातन परम्परा में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली गुरु-वन्दनाओं में से एक है। यह दक्षिणामूर्ति से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है — शिव का वह स्वरूप जो वटवृक्ष के नीचे विराजमान हैं और जिन्होंने अपने मौन मात्र से उन वृद्ध ऋषियों के संशय दूर कर दिए जो शिष्य बनकर उनके पास आए थे। यह श्लोक गुरु की समस्त वेदान्तिक दृष्टि को संक्षिप्त कर देता है: गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो ब्रह्म के साथ अभिन्न है, समस्त मनों की साक्षी, द्वन्द्वों एवं गुणों से परे।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा कहती है कि चारों सनातन कुमार, वृद्ध ऋषि होते हुए भी, वटवृक्ष के नीचे विराजमान दक्षिणामूर्ति के मौन उपदेश से तत्क्षण संशय-मुक्त हो गए; इस श्लोक का श्रद्धापूर्वक पाठ उसी निःशब्द कृपा का आह्वान करता है, जो सच्चे साधक के हृदय में अज्ञान को विलीन कर देती है।
मंत्र
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ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥
Brahmānandaṃ paramasukhadaṃ kevalaṃ jñānamūrtiṃ Dvandvātītaṃ gaganasadṛśaṃ tattvamasyādilakṣyam Ekaṃ nityaṃ vimalam achalaṃ sarvadhīsākṣibhūtaṃ Bhāvātītaṃ triguṇarahitaṃ sadguruṃ taṃ namāmi
अर्थ:जो ब्रह्म का आनन्दस्वरूप, परम सुख का दाता, केवल (अद्वितीय) और ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं; जो द्वन्द्वों से परे, आकाश के समान व्यापक एवं निर्लेप, तथा 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के लक्ष्य हैं; जो एक, नित्य, निर्मल और अचल हैं, समस्त बुद्धियों के साक्षी, भावों से अतीत और तीनों गुणों से रहित हैं — उन सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ब्रह्मानन्दं परमसुखदं (गुरु / दक्षिणामूर्ति ध्यान) पाठ के लाभ
अध्ययन या ध्यान से पूर्व सद्गुरु की कृपा एवं उपस्थिति का आह्वान करता है
मन को साक्षी-स्वरूप आत्मा की चेतना (साक्षी-भाव) में स्थिर करता है
वेदान्त अध्ययन के लिए आदर्श माना जाता है, क्योंकि यह महावाक्य 'तत्त्वमसि' को मूर्त करता है
आन्तरिक स्थिरता एवं श्रद्धा जगाता है (दक्षिणामूर्ति का मौन उपदेश)
आध्यात्मिक अज्ञान को दूर करता है और सत्-असत् के विवेक को गहरा करता है
तीनों गुणों से परे तत्त्व की ओर ध्यान मोड़कर परम शान्ति का भाव देता है
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं (गुरु / दक्षिणामूर्ति ध्यान) जप विधि
पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके शान्त भाव से बैठें। आँखें बंद कर श्लोक को धीरे-धीरे तीन बार पढ़ें, और प्रत्येक पद के अर्थ पर मन को टिकाएँ — विशेषकर 'सर्वधी-साक्षिभूतम्' (समस्त विचारों के साक्षी) पर। इसे पारंपरिक रूप से वेदान्त पाठों से पूर्व, अपने गुरु से मिलने से पूर्व, तथा दक्षिणामूर्ति — मौन में उपदेश देने वाले गुरु — पर मौन ध्यान से पूर्व आरम्भिक प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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