दक्षिणामूर्ति अष्टकम्
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✦ अर्थ
दक्षिणामूर्ति अष्टकम् भगवान शिव की दक्षिणामूर्ति — परम मौन गुरु — के रूप में आठ श्लोकों की स्तुति है। यह उस तरुण गुरु का गुणगान करती है जो अपने चरणों में बैठे वृद्ध ऋषियों को मौन के द्वारा आत्मज्ञान का परम उपदेश देते हैं। श्रद्धा से इसका पाठ करने पर भगवान की कृपा, शान्ति और रक्षा प्राप्त होती है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional · Vrishabhadeva · Classical
दक्षिणामूर्ति अष्टकम् परम्परागत रूप से वृषभदेव को आरोपित है। यह दक्षिणामूर्ति — परम मौन गुरु रूप शिव — की आठ श्लोकों की स्तुति है, जो तरुण गुरु अपने चरणों में बैठे वृद्ध ऋषियों को मौन के द्वारा आत्मज्ञान का परम उपदेश देते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से दक्षिणामूर्ति अष्टकम् का पाठ करना भगवान की कृपा के निकट जाना है, जो प्रेम से उन्हें पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागते।
मंत्र
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अगणितगुणगणमप्रमेमाद्यं सकलजगत्स्थितिसम्यमादिहेतुम् । उपरतमनोयोगिहृन्मन्दिरम्तं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ १॥ निरवधिसुखमिष्टदातारमीड्यं नतजनमनस्तापभेदैकदक्षम् । भवविपिनदवाग्निनामधेयं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ २॥ त्रिभुवनगुरुमागमैकप्रमाणं त्रिजगत्कारणसूत्रयोगमायम् । रविशतभास्वरमीहितप्रधानं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ३॥ अविरतभवभावनादिदूरं पदपद्मद्वयभाविनामदूरम् । भवजलधिसुतारणमङ्घ्रिपोतं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ४॥ कृतनिलयमनिशं वटाकमूले निगमशिखाव्रातबोधितैकरूपम् । धृतमुद्राङ्गुळिगम्यचारुरूपं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ५॥ द्रुहिणसुतपूजिताङ्घ्रिपद्मं पदपद्मानतमोक्षदानदक्षम् । कृतगुरुकुलवासयोगिमित्रं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ६॥ यतिवरहृदये सदा विभान्तं रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गमाद्यम् । परहितनिरतात्मनं सुसेव्यं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ७॥ स्मितधवळविकासिताननाब्जं श्रुतिसुलभं वृषभाधिरूढगात्रम् । सितजलजसुशोभिदेहकान्तिं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ८॥ वृषभकृतमिदमिष्टसिद्धिदं गुरुवरदेवसन्निधौ पठेद्यः । सकलदुरितदुःखवर्गहानिं व्रजति चिरं ज्ञानवान् शम्भुलोकम् ॥ ९॥ इति श्रीव्ऱ्^षभदेवविरचितं श्रीदक्षिणामूर्त्यष्टकं सम्पूर्णम् ।
agaṇitaguṇagaṇamapramemādyaṃ sakalajagatsthitisamyamādihetum | uparatamanoyogihṛnmandiramtaṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 1|| niravadhisukhamiṣṭadātāramīḍyaṃ natajanamanastāpabhedaikadakṣam | bhavavipinadavāgnināmadheyaṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 2|| tribhuvanagurumāgamaikapramāṇaṃ trijagatkāraṇasūtrayogamāyam | raviśatabhāsvaramīhitapradhānaṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 3|| aviratabhavabhāvanādidūraṃ padapadmadvayabhāvināmadūram | bhavajaladhisutāraṇamaṅghripotaṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 4|| kṛtanilayamaniśaṃ vaṭākamūle nigamaśikhāvrātabodhitaikarūpam | dhṛtamudrāṅgul̤igamyacārurūpaṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 5|| druhiṇasutapūjitāṅghripadmaṃ padapadmānatamokṣadānadakṣam | kṛtagurukulavāsayogimitraṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 6|| yativarahṛdaye sadā vibhāntaṃ ratipatiśatakoṭisundarāṅgamādyam | parahitaniratātmanaṃ susevyaṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 7|| smitadhaval̤avikāsitānanābjaṃ śrutisulabhaṃ vṛṣabhādhirūḍhagātram | sitajalajasuśobhidehakāntiṃ satatamahaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe || 8|| vṛṣabhakṛtamidamiṣṭasiddhidaṃ guruvaradevasannidhau paṭhedyaḥ | sakaladuritaduḥkhavargahāniṃ vrajati ciraṃ jñānavān śambhulokam || 9|| iti śrīvṟ^ṣabhadevaviracitaṃ śrīdakṣiṇāmūrtyaṣṭakaṃ sampūrṇam |
अर्थ:दक्षिणामूर्ति — परम मौन गुरु रूप शिव — की आठ श्लोकों की स्तुति, जो तरुण गुरु अपने चरणों में बैठे वृद्ध ऋषियों को मौन द्वारा आत्मज्ञान का परम उपदेश देते हैं।
दक्षिणामूर्ति अष्टकम् पाठ के लाभ
दक्षिणामूर्ति अष्टकम् का पाठ भगवान की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करने वाला माना जाता है।
भक्ति को बढ़ाता है, मन को शान्त करता है और हृदय को भगवान के स्मरण में स्थिर करता है।
सोमवार को, तथा महाशिवरात्रि, प्रदोष और श्रावण मास में सर्वाधिक शुभ।
एक छोटा, मधुर स्तोत्र जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन पढ़ सकता है।
दक्षिणामूर्ति अष्टकम् जप विधि
स्नान करके पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके देवता की प्रतिमा के सम्मुख बैठें। दीप जलाएँ और दक्षिणामूर्ति अष्टकम् का धीरे-धीरे, श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इसे प्रतिदिन, अथवा विशेषतः महाशिवरात्रि, प्रदोष और श्रावण मास में पढ़ा जा सकता है। अन्त में कृपा और रक्षा की प्रार्थना से समापन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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