ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति — Word-by-Word Meaning
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
सः यः ह वै
sa yo ha vai
सः यः ह वै — वह जो, निश्चय ही, वास्तव में
तत् परमम् ब्रह्म
tat paramam brahma
तत् परमम् ब्रह्म — उस परम ब्रह्म को
वेद
veda
वेद — जान लेता है, साक्षात्कार कर लेता है
ब्रह्म एव भवति
brahma eva bhavati
ब्रह्म एव भवति — स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है
न अस्य अब्रह्मवित् कुले भवति
na asya abrahmavit kule bhavati
न अस्य अब्रह्मवित् कुले भवति — उसके कुल में कोई भी ब्रह्म को न जानने वाला उत्पन्न नहीं होता
तरति शोकम्
tarati śokam
तरति शोकम् — वह शोक को पार कर जाता है, दुःख से परे चला जाता है
तरति पाप्मानम्
tarati pāpmānam
तरति पाप्मानम् — वह पाप और अशुभ को पार कर जाता है
गुहाग्रन्थिभ्यः
guhāgranthibhyaḥ
गुहाग्रन्थिभ्यः — हृदय की गाँठों से (हृदय-गुहा में छिपे बन्धनों से)
विमुक्तः
vimuktaḥ
विमुक्तः — पूर्णतया मुक्त, छूटा हुआ
अमृतः भवति
amṛtaḥ bhavati
अमृतः भवति — अमर हो जाता है
Complete Translation
जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है; उसके कुल में कोई भी ब्रह्म को न जानने वाला उत्पन्न नहीं होता। वह शोक को पार कर जाता है, पाप को पार कर जाता है, और हृदय की गाँठों से मुक्त होकर अमर हो जाता है।
Origin & History
Source: Mundaka Upanishad, Verse 3.2.9
Author: Traditional (Upanishadic)
Period: Vedic / Upanishadic
मुण्डक उपनिषद् साधक को कर्मकाण्ड और ग्रन्थों की अपरा विद्या से उस परा विद्या की ओर ले जाता है जिससे अविनाशी ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। अपने अन्तिम भाग में यह उस मुक्त ज्ञाता का वर्णन करता है, जो हृदय की गुहा में परम आत्मा का दर्शन कर लेने पर अज्ञान की गाँठों को कटा हुआ और समस्त संशयों को विलीन हुआ पाता है। यह श्लोक उस उपदेश का शिखर है, जो गूँजती हुई घोषणा करता है कि जो भी परम ब्रह्म को जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है, शोक और पाप को पार कर अमरत्व में प्रवेश करता है।
Frequently Asked Questions
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है 'ब्रह्म का ज्ञाता स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है'। यह सिखाता है कि परम सत्य का साक्षात्कार कोई पृथक् वस्तु पाना नहीं, अपितु अपनी ब्रह्म-रूप पहचान में जाग जाना है — शोक और पाप को पार कर अमर हो जाना है।
यह श्लोक कहाँ से आया है?▼
यह मुण्डक उपनिषद् (3.2.9) से है, जो अथर्ववेद से सम्बन्धित है। मुण्डक उपनिषद् ब्रह्म की परा विद्या को अपरा विद्या से पृथक् करने के लिए, तथा एक ही वृक्ष पर दो पक्षियों के रूपक के लिए प्रसिद्ध है।
'हृदय की गाँठें' क्या हैं?▼
'हृदय की गाँठें' (हृदय-ग्रन्थि) अज्ञान, इच्छा और अहंकार-भाव के वे गहन बन्धन हैं जो आत्मा को शरीर और संसार से बाँधते हैं। मुण्डक उपनिषद् कहता है कि जब मनुष्य परम आत्मा का दर्शन कर लेता है, तब ये गाँठें कट जाती हैं, सब संशय मिट जाते हैं और उसके कर्म क्षीण हो जाते हैं।
क्या ब्रह्म हो जाने का अर्थ है कि व्यक्ति लुप्त हो जाता है?▼
इसका अर्थ विनाश नहीं, अपितु पृथक्, सीमित आत्म-भाव के मिथ्या बोध का गिर जाना है। जो शेष रहता है वह सदा-विद्यमान सत्य ब्रह्म है, जो अपने ही वास्तविक स्वरूप के रूप में पहचाना जाता है — पूर्ण, आनन्दमय और अमर। व्यक्तिगत भ्रम समाप्त होता है; अनन्त सत्ता प्रकाशित होती है।
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