ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति
अन्य नाम / खोज: brahmavid brahmaiva bhavati · sa yo ha vai tat paramam brahma veda · tarati shokam tarati papmanam · the knower of brahman becomes brahman
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✦ अर्थ
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति मुण्डक उपनिषद् की सर्वाधिक प्रसिद्ध उद्घोषणाओं में से एक है, जो आत्मज्ञान के फल को घोषित करती है — परम ब्रह्म का ज्ञाता स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। ऐसा पुरुष शोक और पाप को पार कर जाता है, और हृदय की गाँठों से मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त करता है। यह श्लोक वेदान्त का वह उत्कृष्ट वचन है जो दर्शाता है कि मुक्ति कोई दूरस्थ पुरस्कार नहीं, अपितु ज्ञाता की ज्ञेय के साथ अभिन्नता ही है।
उत्पत्ति और कथा
Mundaka Upanishad, Verse 3.2.9 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic
मुण्डक उपनिषद् साधक को कर्मकाण्ड और ग्रन्थों की अपरा विद्या से उस परा विद्या की ओर ले जाता है जिससे अविनाशी ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। अपने अन्तिम भाग में यह उस मुक्त ज्ञाता का वर्णन करता है, जो हृदय की गुहा में परम आत्मा का दर्शन कर लेने पर अज्ञान की गाँठों को कटा हुआ और समस्त संशयों को विलीन हुआ पाता है। यह श्लोक उस उपदेश का शिखर है, जो गूँजती हुई घोषणा करता है कि जो भी परम ब्रह्म को जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है, शोक और पाप को पार कर अमरत्व में प्रवेश करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
मुण्डक उपनिषद् घोषणा करता है कि जब द्रष्टा स्वर्णिम वर्ण वाले स्रष्टा, ईश, पुरुष, ब्रह्मा के उद्गम का दर्शन कर लेता है, तब वह पुण्य और पाप दोनों को झाड़कर, निष्कलंक होकर परम एकत्व को प्राप्त करता है; और यह पुष्टि करता है कि उस तत्त्व के दर्शन होने पर हृदय की गाँठ कट जाती है, समस्त संशय छिन्न हो जाते हैं और कर्म क्षीण हो जाते हैं।
मंत्र
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स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥
sa yo ha vai tat paramaṁ brahma veda brahmaiva bhavati nāsyābrahmavit kule bhavati tarati śokaṁ tarati pāpmānaṁ guhāgranthibhyo vimukto'mṛto bhavati
अर्थ:जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है; उसके कुल में कोई भी ब्रह्म को न जानने वाला उत्पन्न नहीं होता। वह शोक को पार कर जाता है, पाप को पार कर जाता है, और हृदय की गाँठों से मुक्त होकर अमर हो जाता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति पाठ के लाभ
आत्मज्ञान के परम फल की घोषणा करता है — ब्रह्म का ज्ञाता स्वयं ब्रह्म हो जाता है।
मुक्ति को परब्रह्म से अभिन्नता के रूप में दर्शाता है, न कि किसी दूरस्थ बाह्य पुरस्कार के रूप में।
शोक से तथा पाप के बन्धन से मुक्ति का वचन देता है।
उन 'हृदय की गाँठों' को शिथिल करने की बात करता है जो मनुष्य को अज्ञान और अहंकार से बाँधती हैं।
साक्षात्कार द्वारा अमरत्व (अमृत) का आश्वासन प्रदान करता है।
वेदान्तिक विचार एवं ध्यान के लक्ष्य में दृढ़ विश्वास सुदृढ़ करने हेतु पाठ किया जाता है।
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति जप विधि
इस श्लोक का पाठ अभिपुष्टि और आकांक्षा दोनों के रूप में करें, इस सत्य को धारण करते हुए कि ब्रह्म को जानना ही ब्रह्म होना है। चिन्तन करते समय अनुभव करें कि 'हृदय की गाँठें' — संशय, इच्छा और पृथक्ता का भाव — क्रमशः शिथिल हो रही हैं। शोक और पाप को पार करने का आश्वासन मन को स्थिर करे। समापन में अपने ही अमर ब्रह्म-स्वरूप पर मौन ध्यान में लीन हो जाएँ।