चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाः — Word-by-Word Meaning
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाः
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
चला
calā
चंचल, अस्थिर, सदा गतिशील
लक्ष्मीः
lakṣmīḥ
धन, सम्पत्ति, समृद्धि
चलाः
calāḥ
चंचल, क्षणभंगुर (बहुवचन)
प्राणाः
prāṇāḥ
प्राण, जीवन-वायु, जीवन ही
चलम्
calam
चंचल, नश्वर
जीवितयौवनम्
jīvita-yauvanam
जीवन और यौवन
चलाचलम्
calācalam
चंचल एवं अस्थिर, क्षणभंगुर एवं सदा परिवर्तनशील
इदम्
idam
यह, यह सब
सर्वम्
sarvam
सब कुछ, सम्पूर्ण संसार
कीर्तिः
kīrtiḥ
कीर्ति, यश, सुयश
यस्य
yasya
जिसकी, जिसके पास हो
सः
saḥ
वह, वही व्यक्ति
जीवति
jīvati
जीता है, सचमुच जीवित रहता है
Complete Translation
लक्ष्मी (धन) चंचल है, प्राण चंचल हैं, जीवन और यौवन भी चंचल हैं; यह सम्पूर्ण संसार चलायमान और अस्थिर है — केवल वही सचमुच जीवित रहता है जिसकी कीर्ति (सुयश) स्थायी होती है। यह श्लोक सिखाता है कि चूँकि समस्त सांसारिक वस्तुएँ नश्वर हैं, अतः श्रेष्ठ कर्मों से अर्जित चिरस्थायी कीर्ति ही जीवन को सच्चा अर्थ देती है।
Origin & History
Source: Subhashita (Sanskrit niti and vairagya literature)
Author: Traditional (anonymous wisdom verse)
Period: Classical Sanskrit literature
यह श्लोक सांसारिक जीवन की क्षणभंगुरता पर चिन्तनपरक सूक्तियों की सुभाषित परम्परा का अंग है। वैराग्य एवं श्रेष्ठ आकांक्षा जगाने हेतु रचित, यह उन वस्तुओं को शीघ्रता से गिनाता है जिन्हें लोग सर्वाधिक प्रिय मानते हैं — धन, जीवन, यौवन — और प्रत्येक को अस्थिर दर्शाता है, तत्पश्चात् श्रोता को एकमात्र चिरस्थायी निधि की ओर मोड़ देता है: सत्कर्मों से अर्जित सम्माननीय नाम, जिससे व्यक्ति मृत्यु के बहुत बाद तक जीवित रहता है।
Frequently Asked Questions
'चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाः' का अर्थ क्या है?▼
इसका अर्थ है 'धन चंचल है, प्राण चंचल हैं, जीवन और यौवन चंचल हैं।' चूँकि समस्त सांसारिक वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं, यह श्लोक निष्कर्ष देता है कि केवल वही व्यक्ति सचमुच जीवित रहता है जिसकी कीर्ति एवं सुयश स्थायी होते हैं।
इस श्लोक की केन्द्रीय शिक्षा क्या है?▼
कि संसार की प्रत्येक वस्तु — धन, जीवन, यौवन — अनित्य है, और केवल श्रेष्ठ कर्मों से अर्जित यश ही चिरस्थायी रहता है। यह हमें नश्वर सम्पत्ति से चिपकने के बजाय चिरस्थायी सुयश अर्जित करने का आग्रह करता है।
यह श्लोक कहाँ से आया है?▼
यह संस्कृत नीति एवं वैराग्य परम्परा का एक प्रसिद्ध सुभाषित है, जो नश्वरता एवं कीर्ति के अमर मूल्य के विषय पर व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है। ऐसे श्लोक नैतिक एवं चिन्तनपरक सूक्तियों के शास्त्रीय संग्रहों में संरक्षित हैं।
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