Mantra.Tips

चंद्र गायत्री मंत्र — Word-by-Word Meaning

चंद्र गायत्री मंत्र

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

Om
ॐ — आदिनाद, परब्रह्म
क्षीरपुत्राय
Kshiraputraya
क्षीरपुत्राय — क्षीरसागर के पुत्र (चंद्र, जो क्षीरसागर के मंथन से प्रकट हुए) को
विद्महे
Vidmahe
विद्महे — हम जानें / जानने का यत्न करें
अमृततत्त्वाय
Amritatattvaya
अमृततत्त्वाय — जिनका स्वरूप अमृत है, अमरत्व के तत्त्व को
धीमहि
Dhimahi
धीमहि — हम ध्यान करते हैं
तन्नः
Tannah
तन्नः — इसलिए, हमारे लिए / वह
चन्द्रः
Chandrah
चन्द्रः — चंद्र, चंद्रदेव
प्रचोदयात्
Prachodayat
प्रचोदयात् — वे (हमारी बुद्धि को) प्रेरित व प्रकाशित करें

Complete Translation

ॐ। हम क्षीरसागर से उत्पन्न (चंद्र) को जानें, अमृतस्वरूप का ध्यान करें; वे भगवान चंद्र हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें।

Origin & History

Source: The Gayatri mantra of Chandra (the Moon), among the Navagraha Gayatris

Author: Traditional (Vedic)

नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह की अपनी गायत्री होती है — पवित्र गायत्री छंद में वह प्रार्थना जो उस ग्रह से आशीर्वाद और बुद्धि के प्रकाश की याचना करती है। चंद्र गायत्री चंद्र का आवाहन करती है, जो पुराणों में क्षीरसागर के मंथन से अमृत के साथ प्रकट हुए और इसीलिए क्षीरपुत्र (क्षीरसागर के पुत्र) तथा अमृततत्त्व (अमृतस्वरूप) कहलाते हैं। मन व भावनाओं के शीतल स्वामी चंद्र की वन्दना "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के शाश्वत प्रतिमान में की जाती है, विशेषकर सोमवार को और मन की शांति की कामना करते समय।

Frequently Asked Questions

चंद्र गायत्री मंत्र क्या है?
यह चंद्र (चन्द्रमा) की गायत्री है: "ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि। तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात्"। पवित्र गायत्री छंद में रचित यह मंत्र क्षीरसागर के पुत्र और अमृतस्वरूप शीतल चंद्र का आवाहन करता है कि वे मन को शांति दें और बुद्धि को प्रकाशित करें — "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के प्रतिमान में।
चंद्र गायत्री मंत्र के क्या लाभ हैं?
यह मन की शांति, भावनात्मक संतुलन और स्थिरता के लिए, तथा जन्मकुंडली में दुर्बल या पीड़ित चंद्र को बल देने के लिए जपा जाता है। चूँकि चंद्र मन व भावनाओं के स्वामी हैं, यह चिंता और अशांति से राहत, संतोष तथा चंद्र की सौम्य, पोषक कृपा के लिए मूल्यवान है।
चंद्र को क्षीरसागर का पुत्र क्यों कहा जाता है?
पुराणों के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने क्षीरसागर (दूध के समुद्र) का मंथन किया, तब अमृत के साथ चंद्र भी उसके रत्नों में से प्रकट हुए। इसीलिए इस मंत्र में चंद्र को 'क्षीरपुत्र' (क्षीरसागर का पुत्र) और 'अमृततत्त्व' (जिनका स्वरूप अमृत है) कहा गया है।
इसे कब और कितनी बार जपना चाहिए?
इसे माला पर 108 बार जपें, आदर्श रूप से सोमवार — चंद्र के दिन — को प्रातः तथा अन्य सन्ध्या कालों में, और पूर्णिमा को। श्वेत पुष्प और दूध अर्पित करना परम्परा है। इसे दैनिक नवग्रह या गायत्री साधना का अंग बनाया जा सकता है।

Ready to start chanting?

See Benefits & How to Chant →