चंद्र गायत्री मंत्र
अन्य नाम / खोज: om kshiraputraya vidmahe amritatattvaya dhimahi · chandra gayatri · moon gayatri mantra · chandrama gayatri mantra
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
चंद्र गायत्री मंत्र नवग्रहों में चंद्र (चन्द्रमा) की गायत्री छंद में वैदिक प्रार्थना है। क्षीरसागर के पुत्र और अमृतस्वरूप के रूप में सम्बोधित शीतल चंद्र मन, भावनाओं और शांति के स्वामी हैं। यह कमजोर या पीड़ित चंद्र को बल देने तथा मन की शांति, भावनात्मक संतुलन, संतोष और कल्याण के लिए जपा जाता है।
उत्पत्ति और कथा
The Gayatri mantra of Chandra (the Moon), among the Navagraha Gayatris · Traditional (Vedic)
नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह की अपनी गायत्री होती है — पवित्र गायत्री छंद में वह प्रार्थना जो उस ग्रह से आशीर्वाद और बुद्धि के प्रकाश की याचना करती है। चंद्र गायत्री चंद्र का आवाहन करती है, जो पुराणों में क्षीरसागर के मंथन से अमृत के साथ प्रकट हुए और इसीलिए क्षीरपुत्र (क्षीरसागर के पुत्र) तथा अमृततत्त्व (अमृतस्वरूप) कहलाते हैं। मन व भावनाओं के शीतल स्वामी चंद्र की वन्दना "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के शाश्वत प्रतिमान में की जाती है, विशेषकर सोमवार को और मन की शांति की कामना करते समय।
✦ शास्त्रों में वर्णित
चूँकि ज्योतिष में चंद्र मन के स्वामी हैं, चिंता, मनोवेग या दुर्बल चंद्र से पीड़ित जनों को परम्परा से सोमवार को चंद्र गायत्री जपने की सलाह दी जाती है; भक्त इसके सौम्य, शीतल प्रभाव से शांत मन, स्थिर भावनाओं और अधिक शांतिपूर्ण नींद का अनुभव बताते हैं।
मंत्र
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि । तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥
Om Kshiraputraya Vidmahe Amritatattvaya Dhimahi. Tannash Chandrah Prachodayat.
अर्थ:ॐ। हम क्षीरसागर से उत्पन्न (चंद्र) को जानें, अमृतस्वरूप का ध्यान करें; वे भगवान चंद्र हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
चंद्र गायत्री मंत्र पाठ के लाभ
नवग्रहों में चंद्र की गायत्री — कुंडली में चंद्र को बल देने हेतु आवाहित
मन की शांति, भावनात्मक संतुलन, स्थिरता तथा तनाव, चिंता और मानसिक अशांति से राहत हेतु जपा जाता है
ज्योतिष में मन व भावनाओं के स्वामी दुर्बल या पीड़ित चंद्र के अनिष्ट प्रभावों को शांत करने में सहायक
संतोष, सौम्य कल्याण और अच्छी नींद देता है; चंद्र शीतल, पोषक, अमृततुल्य ग्रह हैं
गायत्री होने से यह विद्महे-धीमहि-प्रचोदयात् के शाश्वत प्रतिमान से बुद्धि को प्रकाशित करता है
सोमवार (चंद्र के दिन) तथा सन्ध्या कालों में विशेष रूप से शक्तिशाली
चंद्र गायत्री मंत्र जप विधि
स्नान के पश्चात् शान्त मन से पूर्व की ओर (या सायं चंद्र की ओर) मुख करके बैठें और "ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि। तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात्" का माला पर 108 बार जप करें। सोमवार चंद्र का विशेष दिन है; श्वेत पुष्प, चावल और दूध परम्परागत रूप से अर्पित किए जाते हैं। समस्त गायत्री मंत्रों की भाँति यह आदर्श रूप से सन्ध्या कालों में जपा जाता है। चंद्र को बल देने या मन की शांति की कामना में इसे प्रतिदिन अन्य नवग्रह प्रार्थनाओं सहित जपा जा सकता है।