चन्द्रकवचम्
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✦ अर्थ
चन्द्रकवचम् चन्द्रदेव (सोम) की रक्षात्मक कवच-स्तुति है, जिसके ऋषि गौतम हैं। शान्त चतुर्भुज चन्द्र — जो विष्णु के नेत्र एवं शिव के शिर का अर्धचन्द्र हैं — के ध्यान-श्लोक के पश्चात् यह चन्द्र को उनके अनेक मनोहर नामों (शशी, कलानिधि, सुधाकर, मृगाङ्क) से भक्त के शिर से पाद तक अंग-प्रत्यंग की रक्षा हेतु आमन्त्रित करता है। इसका अन्तिम श्लोक कहता है कि जो इस दिव्य कवच को पढ़ता या सुनता भी है, वह भुक्ति एवं मुक्ति प्राप्त कर सर्वत्र विजयी होता है।
उत्पत्ति और कथा
Chandra Kavacha Stotram (Graha kavacha tradition) · Sage Gautama (rishi of the mantra) · Classical / Puranic
चन्द्रकवचम् नवग्रह कवचों के चक्र से सम्बन्धित है — नौ ग्रहों में से प्रत्येक के लिए रक्षात्मक कवच-स्तुतियाँ — जिसके ऋषि गौतम कहे गए हैं। यह चन्द्र को शान्त, चतुर्भुज चन्द्र के रूप में चित्रित करता है, जो एक साथ विष्णु के नेत्र एवं शिव के शिर पर अर्धचन्द्र-भूषण हैं, और उनके अनेक मनोहर विशेषणों द्वारा भक्त की अंग-प्रत्यंग रक्षा हेतु प्रार्थना करता है। चूँकि चन्द्र मन एवं भावनाओं के अधिपति हैं, यह कवच विशेषतः भीतरी शान्ति तथा पीड़ित चन्द्र को सामञ्जस्य देने हेतु पढ़ा जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कवच का अन्तिम श्लोक वचन देता है कि जो चन्द्र के इस दिव्य कवच को पढ़ता या केवल सुनता भी है, वह 'सर्वत्र विजयी' होता है तथा सांसारिक सुख एवं मुक्ति दोनों प्राप्त करता है; मन की बेचैनी से पीड़ित भक्त इसे सोमवार को चन्द्र की शीतल, चिकित्सक कृपा प्राप्त करने हेतु जपते हैं।
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अस्य श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य गौतम ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥
|| śrīgaṇeśāya namaḥ || asya śrīcandrakavacastotramantrasya gautama ṛṣiḥ | anuṣṭup chandaḥ, śrīcandro devatā, candraprītyarthaṃ jape viniyogaḥ ||
अर्थ:श्रीगणेश को नमस्कार। इस चन्द्रकवच स्तोत्र के ऋषि गौतम हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता श्रीचन्द्र हैं; चन्द्र की प्रसन्नता के लिए इसका जप किया जाता है।
समं चतुर्भुजं वन्दे केयूरमुकुटोज्ज्वलम् । वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥ १॥
samaṃ caturbhujaṃ vande keyūramukuṭojjvalam | vāsudevasya nayanaṃ śaṅkarasya ca bhūṣaṇam || 1||
अर्थ:मैं शान्त, चतुर्भुज, केयूर एवं मुकुट से उज्ज्वल चन्द्र की वन्दना करता हूँ — जो वासुदेव (विष्णु) के नयन हैं और शङ्कर के भूषण (शिर का चन्द्र) हैं।
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् । शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥ २॥
evaṃ dhyātvā japennityaṃ śaśinaḥ kavacaṃ śubham | śaśī pātu śirodeśaṃ bhālaṃ pātu kalānidhiḥ || 2||
अर्थ:इस प्रकार ध्यान करके नित्य इस शुभ चन्द्र-कवच का जप करना चाहिए। शशी मेरे शिर-प्रदेश की रक्षा करें, कलानिधि मेरे भाल की।
चक्षुषी चन्द्रमाः पातु श्रुती पातु निशापतिः । प्राणं क्षपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥ ३॥
cakṣuṣī candramāḥ pātu śrutī pātu niśāpatiḥ | prāṇaṃ kṣapākaraḥ pātu mukhaṃ kumudabāndhavaḥ || 3||
अर्थ:चन्द्रमा मेरे नेत्रों की रक्षा करें, निशापति कानों की; क्षपाकर मेरे प्राण की रक्षा करें, कुमुदबान्धव मुख की।
पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा । करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः ॥ ४॥
pātu kaṇṭhaṃ ca me somaḥ skandhe jaivātṛkastathā | karau sudhākaraḥ pātu vakṣaḥ pātu niśākaraḥ || 4||
अर्थ:सोम मेरे कण्ठ की रक्षा करें, जैवातृक स्कन्धों की; सुधाकर मेरे हाथों की रक्षा करें, निशाकर वक्ष की।
हृदयं पातु मे चन्द्रो नाभिं शङ्करभूषणः । मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ॥ ५॥
hṛdayaṃ pātu me candro nābhiṃ śaṅkarabhūṣaṇaḥ | madhyaṃ pātu suraśreṣṭhaḥ kaṭiṃ pātu sudhākaraḥ || 5||
अर्थ:चन्द्र मेरे हृदय की रक्षा करें, शङ्करभूषण नाभि की; सुरश्रेष्ठ मेरे मध्य की रक्षा करें, सुधाकर कटि की।
ऊरू तारापतिः पातु मृगाङ्को जानुनी सदा । अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥ ६॥
ūrū tārāpatiḥ pātu mṛgāṅko jānunī sadā | abdhijaḥ pātu me jaṅghe pātu pādau vidhuḥ sadā || 6||
अर्थ:तारापति मेरी ऊरुओं की रक्षा करें, मृगाङ्क सदा जानुओं की; अब्धिज मेरी जङ्घाओं की रक्षा करें, विधु सदा पादों की।
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्रोऽखिलं वपुः । एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥
sarvāṇyanyāni cāṅgāni pātu candro'khilaṃ vapuḥ | etaddhi kavacaṃ divyaṃ bhuktimuktipradāyakam | yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sarvatra vijayī bhavet || 7||
अर्थ:चन्द्र मेरे अन्य समस्त अङ्गों एवं सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करें। यह दिव्य कवच भुक्ति एवं मुक्ति दोनों प्रदान करने वाला है; जो इसे पढ़ता अथवा सुनता भी है, वह सर्वत्र विजयी होता है।
॥ इति श्रीचन्द्रकवचं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīcandrakavacaṃ sampūrṇam ||
अर्थ:इस प्रकार चन्द्रकवच सम्पूर्ण हुआ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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चन्द्रकवचम् पाठ के लाभ
एक अंग-प्रत्यंग 'कवच' (रक्षा-कवच) जो शिर से पाद तक सम्पूर्ण शरीर पर चन्द्र की रक्षा का आह्वान करता है।
जन्मकुण्डली में दुर्बल, नीच अथवा पीड़ित चन्द्र को बल देने हेतु पढ़ा जाता है, जो मन, भावनाओं एवं शान्ति का अधिपति है।
मन को शान्त एवं भावनाओं को स्थिर करने वाला कहा जाता है — चन्द्र मानसिक शान्ति एवं सन्तोष के कारक हैं।
इसका फलश्रुति वचन देता है कि जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह भुक्ति एवं मुक्ति दोनों प्राप्त कर सर्वत्र विजयी होता है।
सोमवार (चन्द्र के वार), चन्द्र अथवा नवग्रह पूजा में, तथा पूर्णिमा को जप किया जाता है।
चिन्ता, अनिद्रा, बेचैनी एवं चन्द्र की दशाओं के अशुभ प्रभावों से मुक्ति हेतु आह्वान किया जाता है।
चन्द्रकवचम् जप विधि
स्नान करके पूर्व अथवा उत्तर-पश्चिम की ओर मुख करके, आदर्शतः चन्द्र (अथवा नवग्रह) के चित्र के सम्मुख, श्वेत पुष्प, श्वेत चन्दन एवं घी के दीपक सहित बैठें; चन्द्र को दूध अथवा चावल का अर्पण उपयुक्त है। विनियोग, ध्यान-श्लोक, प्रत्येक अंग की रक्षा करने वाले कवच-श्लोक, तथा अन्तिम फलश्रुति का पाठ करें। यह सोमवार एवं पूर्णिमा रात्रि को सर्वाधिक शुभ है, और मनःशान्ति तथा पीड़ित चन्द्र को कोमल करने हेतु नित्य भी पढ़ा जा सकता है।