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ध्रुव स्तुति Meaning — Line by Line

ध्रुव स्तुति

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of ध्रुव स्तुति with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. yo 'ntaḥ praviśya mama vācam imāṃ prasuptāṃ
  2. Verse 2. ekas tvam eva bhagavann idam ātma-śaktyā
  3. Verse 3. tvad-dattayā vayunayedam acaṣṭa viśvaṃ
  4. Verse 4. nūnaṃ vimuṣṭa-matayas tava māyayā te
  5. Verse 5. yā nirvṛtis tanu-bhṛtāṃ tava pāda-padma-
  6. Verse 6. bhaktiṃ muhuḥ pravahatāṃ tvayi me prasaṅgo
  7. Verse 7. te na smaranty atitarāṃ priyam īśa martyaṃ
  8. Verse 8. tiryaṅ-naga-dvija-sarīsṛpa-deva-daitya-
  9. Verse 9. kalpānta etad akhilaṃ jaṭhareṇa gṛhṇan
  10. Verse 10. tvaṃ nitya-mukta-pariśuddha-vibuddha ātmā
  11. Verse 11. yasmin viruddha-gatayo hy aniśaṃ patanti
  12. Verse 12. satyāśiṣo hi bhagavaṃs tava pāda-padmam
Verse 1#

yo 'ntaḥ praviśya mama vācam imāṃ prasuptāṃ

योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान्नमो भगवते पुरूषाय तुभ्यम्

yo 'ntaḥ praviśya mama vācam imāṃ prasuptāṃ sañjīvayaty akhila-śakti-dharaḥ sva-dhāmnā | anyāṃś ca hasta-caraṇa-śravaṇa-tvag-ādīn prāṇān namo bhagavate puruṣāya tubhyam || 1 ||

Meaningहे प्रभो! आप समस्त शक्तियों के धारक सर्वशक्तिमान हैं। मेरे भीतर प्रविष्ट होकर आपने अपने तेज से मेरी सोई हुई वाणी को पुनः जीवित कर दिया, तथा मेरे हाथ, पैर, कान, त्वचा आदि इन्द्रियों और प्राणों को भी सजीव किया। आप उस परमपुरुष को मेरा नमस्कार है।

Verse 2#

ekas tvam eva bhagavann idam ātma-śaktyā

एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम् सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि

ekas tvam eva bhagavann idam ātma-śaktyā māyākhyayoru-guṇayā mahad-ādy-aśeṣam | sṛṣṭvānuviśya puruṣas tad-asad-guṇeṣu nāneva dāruṣu vibhāvasu-vad vibhāsi || 2 ||

Meaningहे भगवन्! केवल आप ही एक हैं, जो अपनी 'माया' नामक उग्र गुणों वाली शक्ति से महत्तत्त्व आदि समस्त सृष्टि की रचना करके उसमें पुरुषरूप से प्रवेश करते हैं और उसके गुणों में अनेक के समान प्रतीत होते हैं — जैसे एक ही अग्नि विभिन्न काष्ठों में नाना रूपों में प्रकाशित होती है।

Verse 3#

tvad-dattayā vayunayedam acaṣṭa viśvaṃ

त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो

tvad-dattayā vayunayedam acaṣṭa viśvaṃ supta-prabuddha iva nātha bhavat-prapannaḥ | tasyāpavargya-śaraṇaṃ tava pāda-mūlaṃ vismaryate kṛta-vidā katham ārta-bandho || 3 ||

Meaningहे नाथ! आपके द्वारा दी गई बुद्धि से ही यह शरणागत जीव इस विश्व को वैसे देख पाता है जैसे कोई निद्रा से जागा हुआ। हे आर्तबन्धो! फिर कोई विवेकी पुरुष आपके उन चरणकमलों को कैसे भूल सकता है, जो मुक्ति के एकमात्र आश्रय हैं?

Verse 4#

nūnaṃ vimuṣṭa-matayas tava māyayā te

नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य- मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणाम्

nūnaṃ vimuṣṭa-matayas tava māyayā te ye tvāṃ bhavāpyaya-vimokṣaṇam anya-hetoḥ | arcanti kalpaka-taruṃ kuṇapopabhogyam icchanti yat sparśajaṃ niraye 'pi nṝṇām || 4 ||

Meaningनिश्चय ही उनकी बुद्धि आपकी माया से हर ली गई है, जो आपको — कल्पवृक्ष को — जन्म-मृत्यु से छुटकारे आदि किसी अन्य कामना के लिए पूजते हैं; क्योंकि वे जिन स्पर्शजन्य भोगों की इच्छा करते हैं, वे तो शव के समान भोग हैं, जो नरक में भी सुलभ हैं।

Verse 5#

yā nirvṛtis tanu-bhṛtāṃ tava pāda-padma-

या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं‍त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात्

yā nirvṛtis tanu-bhṛtāṃ tava pāda-padma- dhyānād bhavaj-jana-kathā-śravaṇena vā syāt | sā brahmaṇi sva-mahimany api nātha mā bhūt kiṃ tv antakāsi-lulitāt patatāṃ vimānāt || 5 ||

Meaningहे नाथ! आपके चरणकमलों के ध्यान से अथवा आपके भक्तों की कथा सुनने से प्राणियों को जो आनन्द प्राप्त होता है, वह आपके स्वमहिमारूप ब्रह्म (निर्विशेष मोक्ष) में लीन होने पर भी न मिले — फिर मृत्यु की तलवार से जिनके विमान नष्ट हो जाते हैं उन स्वर्गभोगों की तो बात ही क्या!

Verse 6#

bhaktiṃ muhuḥ pravahatāṃ tvayi me prasaṅgo

भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्गो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् येनाञ्जसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः

bhaktiṃ muhuḥ pravahatāṃ tvayi me prasaṅgo bhūyād ananta mahatām amalāśayānām | yenāñjasolbaṇam uru-vyasanaṃ bhavābdhiṃ neṣye bhavad-guṇa-kathāmṛta-pāna-mattaḥ || 6 ||

Meaningहे अनन्त! मुझे सदा उन महान्, निर्मल हृदय वाले भक्तों का संग प्राप्त हो, जिनकी भक्ति निरन्तर आप में प्रवाहित होती है; जिससे आपके गुणों की कथामृत के पान से मतवाला होकर मैं इस घोर विपत्तियों वाले भवसागर को सहज ही पार कर जाऊँ।

Verse 7#

te na smaranty atitarāṃ priyam īśa martyaṃ

ते स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द- सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्गाः

te na smaranty atitarāṃ priyam īśa martyaṃ ye cānv adaḥ suta-suhṛd-gṛha-vitta-dārāḥ | ye tv abja-nābha bhavadīya-padāravinda- saugandhya-lubdha-hṛdayeṣu kṛta-prasaṅgāḥ || 7 ||

Meaningहे कमलनाभ! जिन्होंने आपके चरणकमलों की सुगन्ध के लोभी भक्तों के हृदय में प्रेम कर लिया है, वे, हे ईश! पुत्र, मित्र, घर, धन और स्त्री आदि इस मर्त्यलोक की प्रियतम वस्तुओं का भी स्मरण नहीं करते।

Verse 8#

tiryaṅ-naga-dvija-sarīsṛpa-deva-daitya-

तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं नातः परं परम वेद्मि यत्र वादः

tiryaṅ-naga-dvija-sarīsṛpa-deva-daitya- martyādibhiḥ paricitaṃ sad-asad-viśeṣam | rūpaṃ sthaviṣṭham aja te mahad-ādy-anekaṃ nātaḥ paraṃ parama vedmi na yatra vādaḥ || 8 ||

Meaningहे अज! पशु, वृक्ष, पक्षी, सरीसृप, देव, दैत्य, मनुष्य आदि से व्याप्त, सत् और असत् के भेद वाले आपके इस महत्तत्त्व आदि अनेक रूपों से युक्त स्थूल विश्वरूप को मैं जानता हूँ; इससे परे जो परम तत्त्व है उसे भी जानता हूँ, जिसमें कोई विवाद नहीं।

Verse 9#

kalpānta etad akhilaṃ jaṭhareṇa gṛhṇan

कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृह्णन् शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्के यन्नाभिसिन्धुरुहकाञ्चनलोकपद्म- गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै

kalpānta etad akhilaṃ jaṭhareṇa gṛhṇan śete pumān sva-dṛg ananta-sakhas tad-aṅke | yan-nābhi-sindhu-ruha-kāñcana-loka-padma- garbhe dyumān bhagavate praṇato 'smi tasmai || 9 ||

Meaningजो परमपुरुष कल्पान्त में इस समस्त सृष्टि को अपने उदर में धारण कर, स्वयंप्रकाश रूप से अनन्त शेष को सखा बनाकर उन्हीं की गोद में शयन करते हैं, और जिनकी नाभि-सागर से उत्पन्न स्वर्णिम लोकपद्म के गर्भ में तेजस्वी ब्रह्मा प्रकट होते हैं — उन भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 10#

tvaṃ nitya-mukta-pariśuddha-vibuddha ātmā

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से १०

tvaṃ nitya-mukta-pariśuddha-vibuddha ātmā kūṭa-stha ādi-puruṣo bhagavāṃs try-adhīśaḥ | yad-buddhy-avasthitim akhaṇḍitayā sva-dṛṣṭyā draṣṭā sthitāv adhimakho vyatirikta āsse || 10 ||

Meaningआप नित्यमुक्त, परिशुद्ध, विबुद्ध आत्मा हैं, कूटस्थ आदिपुरुष, त्रिगुण/त्रिलोक के अधीश्वर भगवान् हैं। अपनी अखण्ड दृष्टि से बुद्धि की प्रत्येक अवस्था के द्रष्टा होते हुए भी आप सृष्टि-स्थिति के अध्यक्ष रूप में सबसे पृथक् और निर्लिप्त रहते हैं।

Verse 11#

yasmin viruddha-gatayo hy aniśaṃ patanti

यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् तद्ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य- मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ११

yasmin viruddha-gatayo hy aniśaṃ patanti vidyādayo vividha-śaktaya ānupūrvyāt | tad brahma viśva-bhavam ekam anantam ādyam ānanda-mātram avikāram ahaṃ prapadye || 11 ||

Meaningजिसमें विद्या-अविद्या आदि परस्पर विरुद्ध गति वाली विविध शक्तियाँ क्रमशः निरन्तर उदित होती रहती हैं — उस एक, अनन्त, आदि, आनन्दस्वरूप, निर्विकार, विश्व के उद्गम ब्रह्म की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

Verse 12#

satyāśiṣo hi bhagavaṃs tava pāda-padmam

सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म- माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः अप्येवमार्य भगवान् परिपाति दीनान् वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् १२

satyāśiṣo hi bhagavaṃs tava pāda-padmam āśīs tathānubhajataḥ puruṣārtha-mūrteḥ | apy evam ārya bhagavān paripāti dīnān vāśreva vatsakam anugraha-kātaro 'smān || 12 ||

Meaningहे भगवन्! पुरुषार्थ-स्वरूप आपके चरणकमलों की सेवा करने वाले को जो आशीर्वाद मिलते हैं वे सत्य ही हैं। तथापि, हे आर्य! भगवान् अपने दीन भक्तों की प्रार्थना से भी बढ़कर रक्षा करते हैं — जैसे स्नेह से व्याकुल गाय अपने असहाय बछड़े का पालन करती है।

Word-by-Word Breakdown

योऽन्तः प्रविश्य
yo 'ntaḥ praviśya
जो भीतर प्रविष्ट होकर
मम वाचमिमां प्रसुप्ताम्
mama vācam imāṃ prasuptām
मेरी इस सोई हुई वाणी को
सञ्जीवयति
sañjīvayati
सञ्जीवित करते हैं, जीवन प्रदान करते हैं
अखिलशक्तिधरः
akhila-śakti-dharaḥ
समस्त शक्तियों के धारक, सर्वशक्तिमान
स्वधाम्ना
sva-dhāmnā
अपने तेज / निज शक्ति से
हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
hasta-caraṇa-śravaṇa-tvag-ādīn
हाथ, पैर, कान, त्वचा आदि (इन्द्रियाँ)
प्राणान्
prāṇān
प्राण / जीवनी-शक्तियाँ
नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्
namo bhagavate puruṣāya tubhyam
हे भगवन्! उस परमपुरुष आपको नमस्कार है
एकस्त्वमेव भगवन्
ekas tvam eva bhagavan
हे भगवन्! केवल आप ही एक हैं
आत्मशक्त्या मायाख्यया
ātma-śaktyā māyākhyayā
माया नामक अपनी आत्मशक्ति से
नानेव दारुषु विभावसुवत्
nāneva dāruṣu vibhāvasu-vat
अनेक के समान, जैसे काष्ठों में छिपी अग्नि
सुप्तप्रबुद्ध इव
supta-prabuddha iva
निद्रा से जागे हुए के समान
अपवर्ग्यशरणम्
apavargya-śaraṇam
मुक्ति प्रदान करने वाला आश्रय
तव पादमूलम्
tava pāda-mūlam
आपके चरणों का मूल (चरणकमल)
आर्तबन्धो
ārta-bandho
हे आर्तबन्धो (दुखियों के बन्धु)
कल्पकतरुम्
kalpaka-tarum
कल्पवृक्ष (इच्छापूर्ति करने वाला वृक्ष)
भक्तिं मुहुः प्रवहताम्
bhaktiṃ muhuḥ pravahatām
जिनकी भक्ति निरन्तर प्रवाहित होती है
अनन्त
ananta
हे अनन्त (असीम प्रभो)
भवद्गुणकथामृतपानमत्तः
bhavad-guṇa-kathāmṛta-pāna-mattaḥ
आपके गुणों की कथामृत के पान से मतवाला
अब्जनाभ
abja-nābha
हे कमलनाभ (जिनकी नाभि में कमल है)
पदारविन्दसौगन्ध्य
padāravinda-saugandhya
चरणकमलों की सुगन्ध
नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्धः
nitya-mukta-pariśuddha-vibuddhaḥ
नित्यमुक्त, परिशुद्ध एवं विबुद्ध (पूर्ण जाग्रत)
आदिपुरुषः
ādi-puruṣaḥ
आदिपुरुष (मूल पुरुष)
आनन्दमात्रमविकारम्
ānanda-mātram avikāram
केवल आनन्दस्वरूप, निर्विकार
वाश्रेव वत्सकम्
vāśreva vatsakam
जैसे गाय स्नेहपूर्वक अपने नवजात बछड़े का पालन करती है

Origin & History

Source: Srimad Bhagavata Purana, Canto 4, Chapter 9, verses 6–17 (Dhruva-krita Bhagavat-stuti)

Author: Sage Veda-Vyasa (as spoken by Dhruva Maharaja)

Period: Classical Puranic era

उत्तानपाद राजा के पाँच वर्षीय पुत्र ध्रुव को उसकी विमाता ने अपमानित किया, तब उसने ऐसा पद पाने का संकल्प किया जो किसी ने कभी न जाना हो। नारद मुनि के मार्गदर्शन में उसने मधुवन के वन में कठोर तप करते हुए भगवान् विष्णु का ध्यान किया। उसके दृढ़ निश्चय से प्रसन्न होकर भगवान् उसके समक्ष प्रकट हुए। विस्मित एवं अवाक् बालक के गाल का भगवान् ने अपने शंख से स्पर्श किया, और तत्क्षण ये बारह स्तुति-श्लोक उसके जाग्रत हृदय से प्रवाहित हुए। भगवान् के दर्शन के पश्चात् ध्रुव को उस राज्य की कोई चाह न रही जिसे वह माँगने चला था, और अन्ततः उसे अविनाशी, कभी न गिरने वाला ध्रुव-तारा का शाश्वत पद प्राप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

ध्रुव स्तुति क्या है?
ध्रुव स्तुति वह प्रार्थना है जो बालक-भक्त ध्रुव महाराज ने भगवान् के प्रकट होने पर उन्हें अर्पित की। यह श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कन्ध 4, अध्याय 9, श्लोक 6 से 17) में मिलती है और गहन समर्पण तथा भक्ति के बारह श्लोकों से युक्त है।
ध्रुव की प्रार्थना इतनी प्रसिद्ध क्यों है?
ध्रुव ने मूलतः अपने पिता से बड़ा राज्य पाने हेतु तप किया था, किन्तु भगवान् के दर्शन से उनकी कामना बदल गई। इस स्तुति में वे कुछ भी सांसारिक नहीं माँगते — केवल शुद्ध भक्तों का संग और अखण्ड भक्ति — जिससे यह निष्काम, शुद्ध भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण बन जाती है।
एक बालक ने ऐसी उच्च प्रार्थनाएँ कैसे कीं?
भागवत बताता है कि भगवान् के दर्शन से बालक अवाक् रह गया। तब भगवान् विष्णु ने अपने शंख से ध्रुव के गाल का स्पर्श किया, जिससे उसकी वाणी एवं प्रेरणा जाग उठी — और ये बारह श्लोक उसके हृदय से स्वतः प्रवाहित हुए, जैसा कि प्रथम श्लोक स्वयं वर्णन करता है।
ध्रुव स्तुति का पाठ कब किया जाता है?
इसका पाठ श्रीमद्भागवत के अध्ययन के समय, एकादशी और जन्माष्टमी पर, तथा समर्पण की व्यक्तिगत प्रार्थना के रूप में किया जाता है। कठिनाई अथवा सांसारिक महत्त्वाकांक्षा में पड़े भक्त ध्रुव से प्रेरणा लेते हैं, जिसने अपने प्रयास को भगवान् की ओर मोड़कर ध्रुव-लोक का शाश्वत पद प्राप्त किया।

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