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दिनयामिन्यौ सायं प्रातः — Word-by-Word Meaning

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

दिनयामिन्यौ
Dina-yaminyau
दिन और रात
सायं प्रातः
Sayam pratah
सायं और प्रातः, सन्ध्या और भोर
शिशिरवसन्तौ
Shishira-vasantau
शिशिर और वसन्त (ऋतुएँ)
पुनरायातः
Punar-ayatah
बार-बार आते-जाते हैं, पुनः-पुनः लौटते हैं
कालः
Kalah
काल, समय
क्रीडति
Kridati
क्रीड़ा करता है, खेलता है
गच्छति
Gachchhati
बीत जाता है, सरक जाता है
आयुः
Ayuh
आयु, जीवनकाल
तदपि
Tadapi
फिर भी, तो भी
न मुञ्चति
Na munchati
नहीं छोड़ती, मुक्त नहीं करती
आशावायुः
Asha-vayuh
आशा-रूपी वायु, तृष्णा की आँधी

Complete Translation

दिन-रात, सायं-प्रातः, शिशिर-वसन्त बार-बार आते-जाते हैं; काल क्रीड़ा करता है और आयु बीतती जाती है — फिर भी आशा-रूपी वायु नहीं छोड़ती।

Origin & History

Source: Bhaja Govindam (Moha Mudgara), verse on the play of Time

Author: Adi Shankaracharya

Period: 8th century CE (circa 788-820)

यह श्लोक आदि शंकराचार्य के 'भज गोविन्दम्' का है, जो काशी में सांसारिक जीव को जगाने के लिए रचा गया स्तोत्र है। अनित्यता पर अपनी शिक्षाओं के बीच, यह श्लोक काल को एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में चित्रित करता है जो दिन, रात और ऋतुओं के चक्रों में क्रीड़ा करता है, और साथ ही हमारी आयु को हर ले जाता है। शंकराचार्य की दृष्टि यह है कि मृत्यु की इस निरन्तर याद के बावजूद, 'आशा-रूपी वायु' मनुष्य के हृदय को संचालित करती रहती है — और केवल उस तृष्णा को त्यागकर ही विश्राम मिल सकता है।

Frequently Asked Questions

'दिनयामिन्यौ सायं प्रातः' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'दिन और रात, सायं और प्रातः' — काल के अनन्त चक्रों के साथ शिशिर और वसन्त ऋतुओं का नामकरण, जो बार-बार लौटते हैं जबकि हमारी आयु चुपचाप बीतती जाती है।
इस श्लोक में 'आशा-वायु' क्या है?
'आशा-वायु' का अर्थ है 'आशा और तृष्णा की वायु (या आँधी)।' शंकराचार्य कहते हैं कि जब काल जीवन को हर ले जाता है, तब भी यह अशान्त तृष्णा-वायु मनुष्य के हृदय पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करती — और इससे मुक्त होना ही शान्ति का मार्ग है।
इस श्लोक का सन्देश क्या है?
यह जीवन की अनित्यता और तृष्णा की अथकता सिखाता है। काल खेलता रहता है और हमारे वर्ष सरक जाते हैं, फिर भी हम आशाओं और कामनाओं से चिपके रहते हैं। यह श्लोक हमें जागने, इसे पहचानने और जो शाश्वत है उसकी ओर मुड़ने का आग्रह करता है।
यह श्लोक कहाँ से लिया गया है?
यह आदि शंकराचार्य रचित 'भज गोविन्दम्' (मोह मुद्गर) से है, जो 8वीं शताब्दी ईस्वी में रचा गया — काल और तृष्णा पर इस स्तोत्र के सर्वाधिक काव्यमय चिन्तनों में से एक।

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