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दिनयामिन्यौ सायं प्रातः

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातः या सायं, दिन के परिवर्तन को देखते हुए; अथवा सान्ध्य चिन्तन में·📜 Bhaja Govindam (Moha Mudgara), verse on the play of Time

अन्य नाम / खोज: dina yaminyau sayam pratah · dinam yaminyau sayam pratah · kalah kridati gachchhatyayuh · asha vayuh · bhaja govindam dina yaminyau

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अर्थ

'भज गोविन्दम्' के इस भावपूर्ण श्लोक में आदि शंकराचार्य दिन-रात और ऋतुओं के निरन्तर चक्र को काल की क्रीड़ा के रूप में चित्रित करते हैं, जो चुपचाप हमारी आयु को हर ले जाता है। यद्यपि सब कुछ बीत जाता है और अन्त निकट आता जाता है, फिर भी अथक 'आशा-रूपी वायु' मनुष्य के हृदय पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करती। यह अनित्यता को पहचानने और अनन्त तृष्णा से मुक्त होने का काव्यमय आह्वान है।

उत्पत्ति और कथा

Bhaja Govindam (Moha Mudgara), verse on the play of Time · Adi Shankaracharya · 8th century CE (circa 788-820)

यह श्लोक आदि शंकराचार्य के 'भज गोविन्दम्' का है, जो काशी में सांसारिक जीव को जगाने के लिए रचा गया स्तोत्र है। अनित्यता पर अपनी शिक्षाओं के बीच, यह श्लोक काल को एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में चित्रित करता है जो दिन, रात और ऋतुओं के चक्रों में क्रीड़ा करता है, और साथ ही हमारी आयु को हर ले जाता है। शंकराचार्य की दृष्टि यह है कि मृत्यु की इस निरन्तर याद के बावजूद, 'आशा-रूपी वायु' मनुष्य के हृदय को संचालित करती रहती है — और केवल उस तृष्णा को त्यागकर ही विश्राम मिल सकता है।

शास्त्रों में वर्णित

सन्त इस श्लोक का उल्लेख यह समझाने के लिए करते हैं कि वर्ष क्यों उत्तरोत्तर तीव्र प्रतीत होते हैं और फिर भी तृष्णा कभी नहीं थकती: काल का स्वभाव खेलते रहना और तृष्णा का स्वभाव बना रहना है। जो इसे गहराई से आत्मसात करते हैं, वे शान्त वैराग्य प्राप्त करते हैं, ऋतुओं को बदलते देखते हुए भी उनमें बहे बिना।

मंत्र

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दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि मुञ्चत्याशावायुः

Dinayaminyau sayam pratah shishiravasantau punarayatah Kalah kridati gachchhatyayuh tadapi na munchatyashavayuh

अर्थ:दिन-रात, सायं-प्रातः, शिशिर-वसन्त बार-बार आते-जाते हैं; काल क्रीड़ा करता है और आयु बीतती जाती है — फिर भी आशा-रूपी वायु नहीं छोड़ती।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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दिनयामिन्यौ🔊Dina-yaminyauदिन और रात
सायं प्रातः🔊Sayam pratahसायं और प्रातः, सन्ध्या और भोर
शिशिरवसन्तौ🔊Shishira-vasantauशिशिर और वसन्त (ऋतुएँ)
पुनरायातः🔊Punar-ayatahबार-बार आते-जाते हैं, पुनः-पुनः लौटते हैं
कालः🔊Kalahकाल, समय
क्रीडति🔊Kridatiक्रीड़ा करता है, खेलता है
गच्छति🔊Gachchhatiबीत जाता है, सरक जाता है
आयुः🔊Ayuhआयु, जीवनकाल
तदपि🔊Tadapiफिर भी, तो भी
न मुञ्चति🔊Na munchatiनहीं छोड़ती, मुक्त नहीं करती
आशावायुः🔊Asha-vayuhआशा-रूपी वायु, तृष्णा की आँधी

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः पाठ के लाभ

काल के तीव्र, निरन्तर बीतने की सजीव जागरूकता जगाता है

हृदय को बाँधने वाली अथक 'आशा-रूपी वायु' (तृष्णा) को उजागर करता है

अनन्त तृष्णा और सांसारिक वस्तुओं की आशा से वैराग्य की प्रेरणा देता है

जीवन के बीत जाने से पहले उसका सदुपयोग करने को प्रेरित करता है

आदि शंकराचार्य का अनित्यता पर एक काव्यमय ध्यान

आसक्ति की व्यर्थता प्रकट कर अशान्ति को शान्त करता है

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातः या सायं, दिन के परिवर्तन को देखते हुए; अथवा सान्ध्य चिन्तन में

इस श्लोक का पाठ इसमें नामित प्राकृतिक चक्रों — दिन-रात, ऋतुओं — पर चिन्तन करते हुए करें, और अनुभव करें कि काल किस प्रकार चुपचाप जीवन को बहा ले जाता है। 'आशा-वायु' (तृष्णा की आँधी) की छवि को अपनी ही कामनाओं पर ईमानदार चिन्तन के लिए प्रेरक बनने दें। दैनिक चिन्तन के रूप में प्रयोग करने पर यह आसक्ति को धीरे-धीरे ढीला करता है और शाश्वत की खोज के संकल्प को नवीन करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका अर्थ है 'दिन और रात, सायं और प्रातः' — काल के अनन्त चक्रों के साथ शिशिर और वसन्त ऋतुओं का नामकरण, जो बार-बार लौटते हैं जबकि हमारी आयु चुपचाप बीतती जाती है।
'आशा-वायु' का अर्थ है 'आशा और तृष्णा की वायु (या आँधी)।' शंकराचार्य कहते हैं कि जब काल जीवन को हर ले जाता है, तब भी यह अशान्त तृष्णा-वायु मनुष्य के हृदय पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करती — और इससे मुक्त होना ही शान्ति का मार्ग है।
यह जीवन की अनित्यता और तृष्णा की अथकता सिखाता है। काल खेलता रहता है और हमारे वर्ष सरक जाते हैं, फिर भी हम आशाओं और कामनाओं से चिपके रहते हैं। यह श्लोक हमें जागने, इसे पहचानने और जो शाश्वत है उसकी ओर मुड़ने का आग्रह करता है।
यह आदि शंकराचार्य रचित 'भज गोविन्दम्' (मोह मुद्गर) से है, जो 8वीं शताब्दी ईस्वी में रचा गया — काल और तृष्णा पर इस स्तोत्र के सर्वाधिक काव्यमय चिन्तनों में से एक।

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