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द्वादश स्तोत्र Meaning — Line by Line

द्वादश स्तोत्र

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of द्वादश स्तोत्र with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

Verse 1#

Vande vandyaṁ sadānandaṁ vāsudevaṁ nirañjanam।

वन्दे वन्द्यं सदानन्दं वासुदेवं निरञ्जनम्। इन्दिरा-पति-माद्य-आदि-वरद-इष्ट-वर-प्रदम्॥

Vande vandyaṁ sadānandaṁ vāsudevaṁ nirañjanam। Indirā-pati-mādya-ādi-varada-iṣṭa-vara-pradam॥

Meaningमैं वासुदेव को प्रणाम करता हूँ — जो वन्दनीय हैं, सदा आनन्दमय हैं, निर्मल और निरंजन हैं, इन्दिरा (लक्ष्मी) के पति हैं, श्रेष्ठ वरदाता हैं और सभी इष्ट वरदान देने वाले हैं।

Verse 2#

Namāmi nikhila-ādhāra-durita-agha-ogha-nāśanam।

नमामि निखिल-आधार-दुरित-अघ-ओघ-नाशनम्। परमानन्द-तीर्थ-उक्तं हरि-पादाब्ज-षट्पदम्॥

Namāmi nikhila-ādhāra-durita-agha-ogha-nāśanam। Paramānanda-tīrtha-uktaṁ hari-pādābja-ṣaṭpadam॥

Meaningमैं उन भगवान को नमस्कार करता हूँ जो समस्त सृष्टि के आधार हैं, पाप और अघ के समूह का नाश करने वाले हैं — जिनकी स्तुति आनन्दतीर्थ (मध्वाचार्य) ने की, जो हरि के चरण-कमलों के भ्रमर हैं।

Verse 3#

Sṛṣṭi-sthiti-saṁhāra-kartāraṁ viśva-tomukham।

सृष्टि-स्थिति-संहार-कर्तारं विश्व-तोमुखम्। सर्व-ज्ञं सर्व-शक्तिं तं नमामि श्रिय-पति हरिम्॥

Sṛṣṭi-sthiti-saṁhāra-kartāraṁ viśva-tomukham। Sarva-jñaṁ sarva-śaktiṁ taṁ namāmi śriya-pati harim॥

Meaningमैं उन श्रीपति हरि को प्रणाम करता हूँ — जो सृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता हैं, जिनके मुख सब ओर हैं, जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं।

Verse 4#

Oṁ namo bhagavate vāsudevāya॥

नमो भगवते वासुदेवाय॥

Oṁ namo bhagavate vāsudevāya॥

Meaningॐ वासुदेव को नमस्कार है।

Word-by-Word Breakdown

वन्दे
vande
मैं वन्दना करता हूँ, प्रणाम करता हूँ
वन्द्यम्
vandyam
वन्दनीय, समस्त वन्दना और पूजन के योग्य
सदानन्दम्
sadānandam
सदा आनन्दमय, नित्य आनन्दस्वरूप
वासुदेवम्
vāsudevam
वासुदेव, अन्तर्यामी परम प्रभु (कृष्ण / विष्णु)
निरञ्जनम्
nirañjanam
निरंजन, निर्मल, समस्त दोषों से रहित
इन्दिरा-पतिम्
indirā-patim
इन्दिरा (लक्ष्मी) के पति (स्वामी)
इष्ट-वर-प्रदम्
iṣṭa-vara-pradam
इष्ट वरदान देने वाले, मनोवांछित आशीष के दाता
नमामि
namāmi
मैं नमस्कार करता हूँ, प्रणाम करता हूँ
निखिल-आधारम्
nikhila-ādhāram
समस्त विद्यमान के आधार, सबके आश्रय
दुरित-अघ-ओघ-नाशनम्
durita-agha-ogha-nāśanam
पाप और अघ के समूह का नाश करने वाले
परमानन्द-तीर्थ-उक्तम्
paramānanda-tīrtha-uktam
आनन्दतीर्थ (मध्वाचार्य) द्वारा कथित / स्तुत
हरि-पाद-अब्ज-षट्पदम्
hari-pāda-abja-ṣaṭpadam
हरि के चरण-कमलों के भ्रमर (मध्व)
सृष्टि-स्थिति-संहार-कर्तारम्
sṛṣṭi-sthiti-saṁhāra-kartāram
सृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता
विश्व-तोमुखम्
viśva-tomukham
जिनके मुख सब ओर हैं (सर्वव्यापी)
सर्व-ज्ञम्
sarva-jñam
सर्वज्ञ, सब कुछ जानने वाले
सर्व-शक्तिम्
sarva-śaktim
सर्वशक्तिमान, सब सामर्थ्य वाले
श्रिय-पतिम्
śriya-patim
श्री (लक्ष्मी) के पति (स्वामी)
हरिम्
harim
हरि, पाप और दुःख हरने वाले (विष्णु)
वासुदेवाय नमः
vāsudevāya namaḥ
वासुदेव को नमस्कार

Origin & History

Source: Dwadasa Stotra (Madhva / Dvaita Vedanta tradition)

Author: Sri Madhvacharya (Ananda Tirtha)

Period: 13th century CE

श्री मध्वाचार्य ने उडुपी में भगवान कृष्ण की पवित्र मूर्ति की स्थापना के पश्चात् द्वादश स्तोत्र की रचना की। परम्परा बताती है कि उन्हें वह मूर्ति प्राप्त हुई — जिसे कहा जाता है कि प्राचीन काल में रुक्मिणी ने पूजा था — और उसे नित्य पूजा हेतु प्रतिष्ठित किया। उन्होंने भगवान को अन्न अर्पण के समय ये बारह स्तोत्र गाए, गहन दर्शन को हार्दिक भक्ति के साथ मिलाते हुए, और ये तभी से माध्व उपासना के केन्द्र में बने हुए हैं।

Frequently Asked Questions

द्वादश स्तोत्र किसने रचा?
द्वादश स्तोत्र की रचना श्री मध्वाचार्य ने की, जिन्हें आनन्दतीर्थ या पूर्णप्रज्ञ (13वीं शताब्दी ई.) भी कहा जाता है, जो द्वैत (तत्त्ववाद) वेदान्त के प्रवर्तक थे।
'द्वादश स्तोत्र' का अर्थ क्या है?
'द्वादश' का अर्थ बारह है, अतः द्वादश स्तोत्र का अर्थ है 'बारह स्तोत्र' — भगवान विष्णु-वासुदेव की स्तुति में रचे बारह भक्ति-काव्य।
द्वादश स्तोत्र परम्परागत रूप से कब गाया जाता है?
इसे माध्व मन्दिरों में — विशेषकर उडुपी में — नैवेद्य के समय, भगवान कृष्ण को अन्न अर्पण के समारोह में, परम्परागत रूप से गाया जाता है, और भक्तगण इसे अपनी नित्य उपासना के अंग के रूप में भी पढ़ते हैं।
यह विशेष रूप से उडुपी से क्यों जुड़ा है?
श्री मध्वाचार्य ने उडुपी में भगवान कृष्ण की पूजा स्थापित की, जहाँ उनके द्वारा स्थापित विग्रह को नित्य अन्न अर्पण किया जाता है। परम्परानुसार द्वादश स्तोत्र उसी अर्पण के समय गाया जाता है, जिससे यह स्तोत्र उडुपी कृष्ण से घनिष्ठ रूप से जुड़ जाता है।

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