Mantra.Tips
vishnuvasudevakrishnamadhva

द्वादश स्तोत्र

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 नित्य प्रातः या अन्न अर्पण (नैवेद्य) के समय; विशेषकर भोजन से पूर्व और विष्णु पूजा के समय अत्यन्त शुभ·📜 Dwadasa Stotra (Madhva / Dvaita Vedanta tradition)

अन्य नाम / खोज: dwadasha stotra · dvadasa stotra · dvadasha stotra · madhva dwadasa stotra · vande vandyam sadanandam · udupi krishna stotra

Share:

अर्थ

द्वादश स्तोत्र ('बारह स्तोत्र') द्वैत वेदान्त के प्रवर्तक श्री मध्वाचार्य (आनन्दतीर्थ) की प्रिय भक्ति-रचना है। उडुपी में भगवान कृष्ण को नैवेद्य अर्पण के समय परम्परागत रूप से इसका गायन होता है; इसके मधुर श्लोक विष्णु-वासुदेव को परम, आनन्दमय, सर्वव्यापी प्रभु और मोक्षदाता के रूप में स्तुति करते हैं। ये स्तोत्र गहन तत्त्वज्ञान और कोमल भक्ति का संगम हैं और माध्व परम्परा में नित्य पढ़े जाते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Dwadasa Stotra (Madhva / Dvaita Vedanta tradition) · Sri Madhvacharya (Ananda Tirtha) · 13th century CE

श्री मध्वाचार्य ने उडुपी में भगवान कृष्ण की पवित्र मूर्ति की स्थापना के पश्चात् द्वादश स्तोत्र की रचना की। परम्परा बताती है कि उन्हें वह मूर्ति प्राप्त हुई — जिसे कहा जाता है कि प्राचीन काल में रुक्मिणी ने पूजा था — और उसे नित्य पूजा हेतु प्रतिष्ठित किया। उन्होंने भगवान को अन्न अर्पण के समय ये बारह स्तोत्र गाए, गहन दर्शन को हार्दिक भक्ति के साथ मिलाते हुए, और ये तभी से माध्व उपासना के केन्द्र में बने हुए हैं।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा बताती है कि श्री मध्वाचार्य ने एक जहाज़ को तूफान से बचाया, जिसमें गोपीचन्दन (पवित्र मिट्टी) के गोले में से उन्होंने बाल कृष्ण की मूर्ति प्राप्त की और उसे उडुपी में स्थापित किया; माना जाता है कि नित्य अन्न अर्पण के समय गाया गया द्वादश स्तोत्र प्रभु की जीवन्त उपस्थिति को आकृष्ट करता है, और भक्त बताते हैं कि एक बार विग्रह विनम्र सन्त कनकदास को दर्शन देने के लिए घूम गया था।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

श्लोक 1

वन्दे वन्द्यं सदानन्दं वासुदेवं निरञ्जनम्। इन्दिरा-पति-माद्य-आदि-वरद-इष्ट-वर-प्रदम्॥

Vande vandyaṁ sadānandaṁ vāsudevaṁ nirañjanam। Indirā-pati-mādya-ādi-varada-iṣṭa-vara-pradam॥

अर्थ:मैं वासुदेव को प्रणाम करता हूँ — जो वन्दनीय हैं, सदा आनन्दमय हैं, निर्मल और निरंजन हैं, इन्दिरा (लक्ष्मी) के पति हैं, श्रेष्ठ वरदाता हैं और सभी इष्ट वरदान देने वाले हैं।

श्लोक 2

नमामि निखिल-आधार-दुरित-अघ-ओघ-नाशनम्। परमानन्द-तीर्थ-उक्तं हरि-पादाब्ज-षट्पदम्॥

Namāmi nikhila-ādhāra-durita-agha-ogha-nāśanam। Paramānanda-tīrtha-uktaṁ hari-pādābja-ṣaṭpadam॥

अर्थ:मैं उन भगवान को नमस्कार करता हूँ जो समस्त सृष्टि के आधार हैं, पाप और अघ के समूह का नाश करने वाले हैं — जिनकी स्तुति आनन्दतीर्थ (मध्वाचार्य) ने की, जो हरि के चरण-कमलों के भ्रमर हैं।

श्लोक 3

सृष्टि-स्थिति-संहार-कर्तारं विश्व-तोमुखम्। सर्व-ज्ञं सर्व-शक्तिं तं नमामि श्रिय-पति हरिम्॥

Sṛṣṭi-sthiti-saṁhāra-kartāraṁ viśva-tomukham। Sarva-jñaṁ sarva-śaktiṁ taṁ namāmi śriya-pati harim॥

अर्थ:मैं उन श्रीपति हरि को प्रणाम करता हूँ — जो सृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता हैं, जिनके मुख सब ओर हैं, जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं।

श्लोक 4

नमो भगवते वासुदेवाय॥

Oṁ namo bhagavate vāsudevāya॥

अर्थ:ॐ वासुदेव को नमस्कार है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

वन्दे🔊vandeमैं वन्दना करता हूँ, प्रणाम करता हूँ
वन्द्यम्🔊vandyamवन्दनीय, समस्त वन्दना और पूजन के योग्य
सदानन्दम्🔊sadānandamसदा आनन्दमय, नित्य आनन्दस्वरूप
वासुदेवम्🔊vāsudevamवासुदेव, अन्तर्यामी परम प्रभु (कृष्ण / विष्णु)
निरञ्जनम्🔊nirañjanamनिरंजन, निर्मल, समस्त दोषों से रहित
इन्दिरा-पतिम्🔊indirā-patimइन्दिरा (लक्ष्मी) के पति (स्वामी)
इष्ट-वर-प्रदम्🔊iṣṭa-vara-pradamइष्ट वरदान देने वाले, मनोवांछित आशीष के दाता
नमामि🔊namāmiमैं नमस्कार करता हूँ, प्रणाम करता हूँ
निखिल-आधारम्🔊nikhila-ādhāramसमस्त विद्यमान के आधार, सबके आश्रय
दुरित-अघ-ओघ-नाशनम्🔊durita-agha-ogha-nāśanamपाप और अघ के समूह का नाश करने वाले
परमानन्द-तीर्थ-उक्तम्🔊paramānanda-tīrtha-uktamआनन्दतीर्थ (मध्वाचार्य) द्वारा कथित / स्तुत
हरि-पाद-अब्ज-षट्पदम्🔊hari-pāda-abja-ṣaṭpadamहरि के चरण-कमलों के भ्रमर (मध्व)
सृष्टि-स्थिति-संहार-कर्तारम्🔊sṛṣṭi-sthiti-saṁhāra-kartāramसृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता
विश्व-तोमुखम्🔊viśva-tomukhamजिनके मुख सब ओर हैं (सर्वव्यापी)
सर्व-ज्ञम्🔊sarva-jñamसर्वज्ञ, सब कुछ जानने वाले
सर्व-शक्तिम्🔊sarva-śaktimसर्वशक्तिमान, सब सामर्थ्य वाले
श्रिय-पतिम्🔊śriya-patimश्री (लक्ष्मी) के पति (स्वामी)
हरिम्🔊harimहरि, पाप और दुःख हरने वाले (विष्णु)
वासुदेवाय नमः🔊vāsudevāya namaḥवासुदेव को नमस्कार

द्वादश स्तोत्र पाठ के लाभ

समस्त इष्ट वरदान देने वाले विष्णु-वासुदेव की कृपा का आह्वान करता है

परम्परागत रूप से नैवेद्य (अन्न अर्पण) के समय प्रभु की उपस्थिति के आह्वान हेतु गाया जाता है

परम तत्त्व के सम्यक् ज्ञान (ज्ञान) के साथ भक्ति का विकास करता है

संचित पापों और भीतरी अशुद्धियों के भार का नाश करने वाला माना जाता है

दिव्य स्मरण द्वारा शान्ति, सन्तोष और मन की स्थिरता लाता है

हरि के प्रति समर्पण द्वारा भक्त को मोक्ष की ओर ले जाता है

द्वादश स्तोत्र जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयनित्य प्रातः या अन्न अर्पण (नैवेद्य) के समय; विशेषकर भोजन से पूर्व और विष्णु पूजा के समय अत्यन्त शुभ

शान्त, कृतज्ञ मन से भक्ति-सहित पाठ करें या गाएँ, आदर्श रूप में कृष्ण या विष्णु की छवि के समक्ष। सम्पूर्ण कृति में मधुर श्लोकों के बारह स्तोत्र हैं; माध्व परम्परा में इन्हें भगवान को अन्न अर्पण के समय गाया जाता है। यहाँ दिए अनुसार 'वन्दे वन्द्यम्' से आरम्भ करें। परम्परागत धुनों में गाने से भाव गहराता है; वासुदेव को नमस्कार के साथ समाप्त करें। स्वच्छता और समर्पण का भाव साधना को बढ़ाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

द्वादश स्तोत्र की रचना श्री मध्वाचार्य ने की, जिन्हें आनन्दतीर्थ या पूर्णप्रज्ञ (13वीं शताब्दी ई.) भी कहा जाता है, जो द्वैत (तत्त्ववाद) वेदान्त के प्रवर्तक थे।
'द्वादश' का अर्थ बारह है, अतः द्वादश स्तोत्र का अर्थ है 'बारह स्तोत्र' — भगवान विष्णु-वासुदेव की स्तुति में रचे बारह भक्ति-काव्य।
इसे माध्व मन्दिरों में — विशेषकर उडुपी में — नैवेद्य के समय, भगवान कृष्ण को अन्न अर्पण के समारोह में, परम्परागत रूप से गाया जाता है, और भक्तगण इसे अपनी नित्य उपासना के अंग के रूप में भी पढ़ते हैं।
श्री मध्वाचार्य ने उडुपी में भगवान कृष्ण की पूजा स्थापित की, जहाँ उनके द्वारा स्थापित विग्रह को नित्य अन्न अर्पण किया जाता है। परम्परानुसार द्वादश स्तोत्र उसी अर्पण के समय गाया जाता है, जिससे यह स्तोत्र उडुपी कृष्ण से घनिष्ठ रूप से जुड़ जाता है।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides