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एको देवः सर्वभूतेषु गूढः — Word-by-Word Meaning

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

एकः देवः
ekaḥ devaḥ
एक देव, एकमात्र दिव्य तत्त्व
सर्वभूतेषु गूढः
sarvabhūteṣu gūḍhaḥ
सब प्राणियों के भीतर छिपा हुआ, गुप्त
सर्वव्यापी
sarvavyāpī
सर्वव्यापी, सर्वत्र विद्यमान
सर्वभूतान्तरात्मा
sarvabhūtāntarātmā
समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा
कर्माध्यक्षः
karmādhyakṣaḥ
समस्त कर्मों का अध्यक्ष, सभी क्रियाओं का प्रेरक
सर्वभूताधिवासः
sarvabhūtādhivāsaḥ
सभी प्राणियों में निवास करने वाला, सबका आश्रय
साक्षी
sākṣī
साक्षी (सबका द्रष्टा)
चेता
cetā
शुद्ध चैतन्य, चेतनस्वरूप
केवलः
kevalaḥ
केवल, अकेला, असंग, निरुपाधि
निर्गुणः च
nirguṇaḥ ca
और निर्गुण (प्रकृति के गुणों से रहित)

Complete Translation

वह एक ही देव समस्त प्राणियों में गुप्त रूप से विद्यमान है, सर्वव्यापी है, समस्त भूतों का अन्तरात्मा है; वह समस्त कर्मों का अध्यक्ष है, सभी प्राणियों में निवास करने वाला है, साक्षी है, चेतनस्वरूप है, केवल (असंग) और निर्गुण है।

Origin & History

Source: Shvetashvatara Upanishad, Verse 6.11

Author: Traditional (Upanishadic); attributed to the sage Shvetashvatara

Period: Vedic / Upanishadic

श्वेताश्वतर उपनिषद् अपने उत्तर अध्यायों में उस एक परमेश्वर के उदात्त दर्शन तक चढ़ता है जो विश्व का कारण भी है और सबका अन्तर्निवासी आत्मा भी। यह सिखाने के बाद कि उस प्रभु के ऊपर कोई स्वामी नहीं और वही समस्त शक्तियों का स्रोत है, ऋषि यहाँ उसी एक देव को प्रत्येक प्राणी में उसके अन्तरात्मा और साक्षी रूप में छिपा घोषित करते हैं — सर्वव्यापी फिर भी केवल और प्रकृति के गुणों से परे। इस प्रकार यह श्लोक अन्तर्व्यापकता और परत्व को एक ही देव के एक चिन्तन में समेट लेता है।

Frequently Asked Questions

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'एक ईश्वर जो सब प्राणियों में छिपा है'। यह श्लोक घोषित करता है कि एक ही दिव्य तत्त्व प्रत्येक प्राणी में उसके अन्तरात्मा रूप में गुप्त होकर निवास करता है — सर्वव्यापी, समस्त कर्मों का साक्षी, शुद्ध चैतन्य, केवल और सभी गुणों से रहित।
यह श्लोक कहाँ से आया है?
यह श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.11) से है, जो कृष्ण यजुर्वेद का अंश है। यह उपनिषद् एक ब्रह्म के तत्त्वज्ञान को परमेश्वर की गहन भक्ति के साथ जोड़ने के लिए प्रसिद्ध है।
ईश्वर 'सब प्राणियों में' और 'गुणों से परे' दोनों कैसे हो सकता है?
यह श्लोक दोनों सत्यों को एक साथ धारण करता है: अन्तरात्मा रूप में दिव्य तत्त्व सब प्राणियों में निवास और व्याप्त है (अन्तर्व्यापकता); और परम साक्षी एवं शुद्ध चैतन्य के रूप में वह अछूता, अकेला और निर्गुण रहता है (परत्व)। एक ही सत्ता एक साथ सबके भीतर और सबसे परे है।
इस श्लोक की व्यावहारिक शिक्षा क्या है?
इसका व्यावहारिक फल यह है कि हम सबमें एक ही ईश्वर को देखें, जिससे स्वतः प्रेम, समता और करुणा जागती है, और भीतर साक्षी आत्मा के रूप में स्थित रहें। सबमें छिपे एक दिव्य तत्त्व को जान लेना भेद को मिटाकर साधक को शान्ति और एकता में प्रतिष्ठित करता है।

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