एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
अन्य नाम / खोज: eko devah sarva bhuteshu gudhah · eko devah sarvabhuteshu gudhah sarvavyapi · one god hidden in all beings · sakshi cheta kevalo nirgunashcha
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✦ अर्थ
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः श्वेताश्वतर उपनिषद् का तेजोमय श्लोक है, जो घोषित करता है कि एक ही देव समस्त प्राणियों में उनके अन्तरात्मा रूप में गुप्त होकर विराजमान है। सर्वव्यापी और प्रत्येक कर्म का साक्षी यह दिव्य तत्त्व एक ओर सबका अन्तर्निवासी है और दूसरी ओर प्रकृति के गुणों से परे केवल, निर्गुण चैतन्य है। यह श्लोक ईश्वर की सर्वव्यापकता और एक परम सत्ता की अद्वैत दृष्टि को एक साथ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति और कथा
Shvetashvatara Upanishad, Verse 6.11 · Traditional (Upanishadic); attributed to the sage Shvetashvatara · Vedic / Upanishadic
श्वेताश्वतर उपनिषद् अपने उत्तर अध्यायों में उस एक परमेश्वर के उदात्त दर्शन तक चढ़ता है जो विश्व का कारण भी है और सबका अन्तर्निवासी आत्मा भी। यह सिखाने के बाद कि उस प्रभु के ऊपर कोई स्वामी नहीं और वही समस्त शक्तियों का स्रोत है, ऋषि यहाँ उसी एक देव को प्रत्येक प्राणी में उसके अन्तरात्मा और साक्षी रूप में छिपा घोषित करते हैं — सर्वव्यापी फिर भी केवल और प्रकृति के गुणों से परे। इस प्रकार यह श्लोक अन्तर्व्यापकता और परत्व को एक ही देव के एक चिन्तन में समेट लेता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
श्वेताश्वतर उपनिषद् वचन देता है कि जब स्रष्टा की कृपा से और गहन ध्यान से साधक सब प्राणियों में छिपे इस एक प्रभु को देख लेता है, तब हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं, सभी संशय कट जाते हैं और कर्म का बन्धन नष्ट हो जाता है।
मंत्र
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एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥
eko devaḥ sarvabhūteṣu gūḍhaḥ sarvavyāpī sarvabhūtāntarātmā karmādhyakṣaḥ sarvabhūtādhivāsaḥ sākṣī cetā kevalo nirguṇaśca
अर्थ:वह एक ही देव समस्त प्राणियों में गुप्त रूप से विद्यमान है, सर्वव्यापी है, समस्त भूतों का अन्तरात्मा है; वह समस्त कर्मों का अध्यक्ष है, सभी प्राणियों में निवास करने वाला है, साक्षी है, चेतनस्वरूप है, केवल (असंग) और निर्गुण है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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एको देवः सर्वभूतेषु गूढः पाठ के लाभ
एक ईश्वर को सब प्राणियों में समान रूप से विद्यमान अन्तरात्मा के रूप में प्रकट करता है।
सबमें एक ही दिव्य तत्त्व को छिपा देखकर भेद-भाव और पृथकता का बोध मिटाता है।
समस्त जीवों के प्रति सार्वभौम प्रेम, करुणा और श्रद्धा जगाता है।
आत्मा को मौन साक्षी (साक्षी) और सभी गुणों से परे शुद्ध चैतन्य के रूप में पुष्ट करता है।
ईश्वर की भक्ति को निर्गुण निराकार ब्रह्म की अनुभूति के साथ जोड़ता है।
अन्तःशान्ति और विविधता के बीच एकता के दर्शन के लिए इसका पाठ किया जाता है।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः जप विधि
इस श्लोक का पाठ करें और चिन्तन करें कि एक ही दिव्य तत्त्व सब प्राणियों में, अपने सहित, उनके अन्तरात्मा और मौन साक्षी रूप में छिपा है। दिनभर अभ्यास करें कि आप जिससे भी मिलें उसमें उसी एक ईश्वर को छिपा देखें, और श्रद्धा एवं करुणा का भाव बढ़ाएँ। ध्यान में उसी साक्षी चैतन्य रूप में स्थित रहें जिसका यह श्लोक वर्णन करता है — शुद्ध, केवल और सभी गुणों से परे।