गणानां त्वा गणपतिं हवामहे — Word-by-Word Meaning
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
गणानाम्
Gananam
गणों का (समूहों, गणसमुदायों एवं समस्त प्राणियों का)
त्वा
tva
आपको
गणपतिम्
ganapatim
गणपति को (गणों के स्वामी)
हवामहे
havamahe
हम आवाहन करते हैं / हम पुकारते हैं (हवि सहित)
कविम्
kavim
कवि, ज्ञानी द्रष्टा
कवीनाम्
kavinam
(समस्त) कवियों एवं ऋषियों में
उपमश्रवस्तमम्
upamashravastamam
सर्वाधिक प्रसिद्ध, अनुपम कीर्ति वाले / महिमा में सर्वश्रेष्ठ
ज्येष्ठराजम्
jyeshtharajam
ज्येष्ठ, सर्वप्रथम राजा / शासक
ब्रह्मणाम्
brahmanam
प्रार्थनाओं के / सनातन शब्द के ज्ञाताओं के
ब्रह्मणस्पते
brahmanaspate
हे ब्रह्मणस्पति — पवित्र शब्द (मन्त्र) एवं प्रार्थना के स्वामी
आ नः
a nah
हमारे पास
शृण्वन्
shrinvan
(हमारी प्रार्थनाओं को) सुनते हुए
ऊतिभिः
utibhih
अपनी रक्षाओं / सहायताओं / कृपाओं के साथ
सीद सादनम्
sida sadanam
विराजिए (पूजास्थल में / हमारे हृदय में आसीन हों)
Complete Translation
ॐ। हे गणपति, हम आपका आवाहन करते हैं — समस्त गणों (होस्तों एवं प्राणियों) के स्वामी, कवियों में कवि, अनुपम कीर्ति वाले, ब्रह्म (मन्त्र-शक्ति) के ज्येष्ठ राजा — हे ब्रह्मणस्पति, हमारी प्रार्थना सुनकर अपनी रक्षक कृपाओं के साथ हमारे पास आइए और (हमारे पूजास्थल एवं हृदय में) विराजिए।
Origin & History
Source: Rig Veda, Mandala 2, Sukta 23, Verse 1 (also in later Ganapati liturgy)
Author: Rishi Gritsamada (Vedic seer of the second Mandala)
Period: Vedic
यह मन्त्र ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के २३वें सूक्त का प्रारम्भ करता है, जो परम्परा में ऋषि गृत्समद को आरोपित है, और ब्रह्मणस्पति — प्रार्थना एवं पवित्र शब्द के स्वामी — को सम्बोधित है। चूँकि यह 'गणपतिम्', गणों के स्वामी, का नाम लेता है और उन्हें द्रष्टाओं में श्रेष्ठ एवं पवित्र शब्द का ज्येष्ठ राजा बताता है, अतः यह समस्त परवर्ती परम्परा में गणेश का सर्वोच्च वैदिक आवाहन बन गया, जिसे पूजा, अग्नि-अनुष्ठान एवं अध्ययन के आरम्भ में जपा जाता है।
Frequently Asked Questions
'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे' क्या है?▼
यह ऋग्वेद २.२३.१ का प्रथम मन्त्र है — गणपति, गणों के स्वामी, का सर्वाधिक प्राचीन एवं पवित्र वैदिक आवाहन। यह उन्हें ब्रह्मणस्पति, पवित्र शब्द के स्वामी, के रूप में सम्बोधित करता है, उन्हें श्रेष्ठ द्रष्टा बताकर अपनी कृपा सहित आने का आह्वान करता है।
क्या यह मन्त्र गणेश के लिए है या बृहस्पति/ब्रह्मणस्पति के लिए?▼
अपने वैदिक सन्दर्भ में यह मन्त्र ब्रह्मणस्पति (बृहस्पति), प्रार्थना एवं पवित्र शब्द के स्वामी, को सम्बोधित है। किन्तु परवर्ती एवं जीवित परम्परा में इसे सर्वत्र गणपति / गणेश के सर्वोच्च वैदिक आवाहन के रूप में जपा जाता है, क्योंकि 'गणपतिम्' शब्द शाब्दिक रूप से गणों के स्वामी का नाम है। दोनों अर्थों में इसका सम्मान होता है।
'गणानां त्वा गणपतिं' कब जपा जाए?▼
इसे पूजा, होम (अग्नि-अनुष्ठान) एवं वैदिक पाठ के प्रारम्भ में गणपति के आवाहन हेतु, तथा अध्ययन, महत्त्वपूर्ण कार्य, परीक्षा या यात्रा आरम्भ करने से पूर्व जपा जाता है। इसे बुद्धि एवं विघ्ननाश हेतु दैनिक जप के रूप में भी दोहराया जा सकता है।
इसे इतना महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?▼
क्योंकि यह गणपति की प्राचीनतम शास्त्रीय (वैदिक) स्तुति है, अतः इसमें महान् प्रामाणिकता एवं पवित्रता है। आरम्भ में ही गणों एवं पवित्र शब्द के स्वामी का आवाहन करने से प्रत्येक उद्यम बुद्धि, रक्षा एवं विघ्नरहित मार्ग से आशीषित माना जाता है।
Ready to start chanting?
See Benefits & How to Chant →