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गणानां त्वा गणपतिं हवामहे

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 किसी भी पूजा, अध्ययन, होम या पाठ के प्रारम्भ में; प्रातःकाल; गणेश चतुर्थी·📜 Rig Veda, Mandala 2, Sukta 23, Verse 1 (also in later Ganapati liturgy)

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अर्थ

गणानां त्वा गणपतिं ऋग्वेद (२.२३.१) का प्रथम मन्त्र है — गणपति, गणों के स्वामी, का सर्वाधिक प्राचीन एवं पवित्र आवाहन, जिन्हें यहाँ ब्रह्मणस्पति (मन्त्र एवं प्रार्थना के स्वामी) के रूप में सम्बोधित किया गया है। यह उन्हें कवियों में कवि, अनुपम महिमा वाला बताकर हमारी प्रार्थना सुनने एवं कृपा सहित हमारे मध्य विराजने का आह्वान करता है। गणपति की प्राचीनतम वैदिक स्तुति होने के कारण इसका पाठ पूजा, अध्ययन एवं प्रत्येक शुभ आरम्भ के प्रारम्भ में किया जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Rig Veda, Mandala 2, Sukta 23, Verse 1 (also in later Ganapati liturgy) · Rishi Gritsamada (Vedic seer of the second Mandala) · Vedic

यह मन्त्र ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के २३वें सूक्त का प्रारम्भ करता है, जो परम्परा में ऋषि गृत्समद को आरोपित है, और ब्रह्मणस्पति — प्रार्थना एवं पवित्र शब्द के स्वामी — को सम्बोधित है। चूँकि यह 'गणपतिम्', गणों के स्वामी, का नाम लेता है और उन्हें द्रष्टाओं में श्रेष्ठ एवं पवित्र शब्द का ज्येष्ठ राजा बताता है, अतः यह समस्त परवर्ती परम्परा में गणेश का सर्वोच्च वैदिक आवाहन बन गया, जिसे पूजा, अग्नि-अनुष्ठान एवं अध्ययन के आरम्भ में जपा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा मानती है कि बिना इस मन्त्र से गणपति का आवाहन किए कोई वैदिक अनुष्ठान शुभ रूप से आरम्भ नहीं होता; किसी भी उद्यम के द्वार पर श्रद्धा सहित जपने पर यह मार्ग के विघ्नों को दूर कर साक्षात् बुद्धि के स्वामी को उपासक के हृदय में आसीन कर देता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्

Om gananam tva ganapatim havamahe Kavim kavinam upamashravastamam Jyeshtharajam brahmanam brahmanaspata A nah shrinvann utibhih sida sadanam

अर्थ:ॐ। हे गणपति, हम आपका आवाहन करते हैं — समस्त गणों (होस्तों एवं प्राणियों) के स्वामी, कवियों में कवि, अनुपम कीर्ति वाले, ब्रह्म (मन्त्र-शक्ति) के ज्येष्ठ राजा — हे ब्रह्मणस्पति, हमारी प्रार्थना सुनकर अपनी रक्षक कृपाओं के साथ हमारे पास आइए और (हमारे पूजास्थल एवं हृदय में) विराजिए।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

गणानाम्🔊Gananamगणों का (समूहों, गणसमुदायों एवं समस्त प्राणियों का)
त्वा🔊tvaआपको
गणपतिम्🔊ganapatimगणपति को (गणों के स्वामी)
हवामहे🔊havamaheहम आवाहन करते हैं / हम पुकारते हैं (हवि सहित)
कविम्🔊kavimकवि, ज्ञानी द्रष्टा
कवीनाम्🔊kavinam(समस्त) कवियों एवं ऋषियों में
उपमश्रवस्तमम्🔊upamashravastamamसर्वाधिक प्रसिद्ध, अनुपम कीर्ति वाले / महिमा में सर्वश्रेष्ठ
ज्येष्ठराजम्🔊jyeshtharajamज्येष्ठ, सर्वप्रथम राजा / शासक
ब्रह्मणाम्🔊brahmanamप्रार्थनाओं के / सनातन शब्द के ज्ञाताओं के
ब्रह्मणस्पते🔊brahmanaspateहे ब्रह्मणस्पति — पवित्र शब्द (मन्त्र) एवं प्रार्थना के स्वामी
आ नः🔊a nahहमारे पास
शृण्वन्🔊shrinvan(हमारी प्रार्थनाओं को) सुनते हुए
ऊतिभिः🔊utibhihअपनी रक्षाओं / सहायताओं / कृपाओं के साथ
सीद सादनम्🔊sida sadanamविराजिए (पूजास्थल में / हमारे हृदय में आसीन हों)

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे पाठ के लाभ

गणपति का प्राचीनतम वैदिक आवाहन — पूजा, अध्ययन एवं किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में जपा जाता है

बुद्धि एवं सनातन शब्द (ब्रह्म) का आवाहन करता है, प्रभु को कवियों में कवि बताकर स्तुति करता है

गणपति / ब्रह्मणस्पति से रक्षा (ऊति) एवं कृपा की प्रार्थना करता है

उद्यम के आरम्भ में जपने पर विघ्नों को दूर कर सफलता लाने वाला माना जाता है

पूजा एवं होम में गणेश की स्थापना एवं आवाहन हेतु एक आधारभूत मन्त्र

मन को स्थिर एवं उन्नत करता है, अध्ययन या प्रार्थना से पूर्व उसे वैदिक स्पन्दन से जोड़ता है

दैनिक जप एवं वैदिक पाठ के प्रारम्भ हेतु उपयुक्त

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयकिसी भी पूजा, अध्ययन, होम या पाठ के प्रारम्भ में; प्रातःकाल; गणेश चतुर्थी

'ॐ' से आरम्भ करें और स्नान करके पूर्व दिशा या देवता की ओर मुख करके बैठकर शुद्ध उच्चारण के साथ मन्त्र का स्पष्ट पाठ करें। इसे पूजा एवं होम के प्रारम्भ में गणपति के आवाहन हेतु जपा जाता है, तथा जप के रूप में ३, ११ या १०८ बार दोहराया जा सकता है। बहुत से लोग वैदिक अध्ययन, महत्त्वपूर्ण कार्य, परीक्षा या यात्रा आरम्भ करने से पूर्व मंगलमय, विघ्नरहित आरम्भ हेतु इसका पाठ करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह ऋग्वेद २.२३.१ का प्रथम मन्त्र है — गणपति, गणों के स्वामी, का सर्वाधिक प्राचीन एवं पवित्र वैदिक आवाहन। यह उन्हें ब्रह्मणस्पति, पवित्र शब्द के स्वामी, के रूप में सम्बोधित करता है, उन्हें श्रेष्ठ द्रष्टा बताकर अपनी कृपा सहित आने का आह्वान करता है।
अपने वैदिक सन्दर्भ में यह मन्त्र ब्रह्मणस्पति (बृहस्पति), प्रार्थना एवं पवित्र शब्द के स्वामी, को सम्बोधित है। किन्तु परवर्ती एवं जीवित परम्परा में इसे सर्वत्र गणपति / गणेश के सर्वोच्च वैदिक आवाहन के रूप में जपा जाता है, क्योंकि 'गणपतिम्' शब्द शाब्दिक रूप से गणों के स्वामी का नाम है। दोनों अर्थों में इसका सम्मान होता है।
इसे पूजा, होम (अग्नि-अनुष्ठान) एवं वैदिक पाठ के प्रारम्भ में गणपति के आवाहन हेतु, तथा अध्ययन, महत्त्वपूर्ण कार्य, परीक्षा या यात्रा आरम्भ करने से पूर्व जपा जाता है। इसे बुद्धि एवं विघ्ननाश हेतु दैनिक जप के रूप में भी दोहराया जा सकता है।
क्योंकि यह गणपति की प्राचीनतम शास्त्रीय (वैदिक) स्तुति है, अतः इसमें महान् प्रामाणिकता एवं पवित्रता है। आरम्भ में ही गणों एवं पवित्र शब्द के स्वामी का आवाहन करने से प्रत्येक उद्यम बुद्धि, रक्षा एवं विघ्नरहित मार्ग से आशीषित माना जाता है।

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