हयग्रीव स्तोत्रम् (हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम्) — Word-by-Word Meaning
हयग्रीव स्तोत्रम् (हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम्)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
Complete Translation
भगवान हयग्रीव — विष्णु के अश्व-मुख स्वरूप, ज्ञान व विद्या के दाता — की स्तुति। "हम हयग्रीव की उपासना करते हैं, जो ज्ञान व आनंद के स्वरूप, निर्मल स्फटिक के समान शुद्ध, और समस्त विद्याओं के आधार हैं।" माध्व संत श्री वादिराज तीर्थ रचित यह स्तोत्र भक्तों को वाणी, बुद्धि व सम्पदा प्रदान करने वाला माना जाता है।
Origin & History
Source: Composed by Sri Vadiraja Tirtha
Author: Sri Vadiraja Tirtha
Period: 16th century
हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम् कर्नाटक के महान माध्व संत श्री वादिराज तीर्थ ने रचा। परम्परा के अनुसार भगवान हयग्रीव — विष्णु के अश्व-मुख स्वरूप व समस्त ज्ञान के स्वामी — प्रतिदिन वादिराज का पकाए हुए चने (हयग्रीव प्रसाद) का भोग ग्रहण करने प्रकट होते थे। यह स्तोत्र हयग्रीव की समस्त विद्या के स्रोत रूप में स्तुति करता है, और इसका अन्तिम श्लोक इन तीन पवित्र श्लोकों का पाठ करने वालों को वाणी व बुद्धि की सम्पदा का वचन देता है।
Frequently Asked Questions
हयग्रीव कौन हैं और यह स्तोत्र क्यों पढ़ा जाता है?▼
हयग्रीव भगवान विष्णु के अश्व-मुख अवतार हैं, जिन्हें ज्ञान, विद्या व वेदों के देव रूप में पूजा जाता है। यह स्तोत्र बुद्धि, स्मृति, वाक्पटुता व अध्ययन में सफलता हेतु पढ़ा जाता है — यह विशेषकर विद्यार्थियों व विद्वानों को प्रिय है।
हयग्रीव स्तोत्रम् किसने रचा?▼
यह सुप्रसिद्ध संक्षिप्त स्तोत्र (हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम्, 'ज्ञानानन्दमयं देवम्' से आरम्भ) श्री वादिराज तीर्थ ने रचा, जो कर्नाटक की माध्व (द्वैत वैष्णव) परम्परा के पूज्य संत थे। इसका अन्तिम श्लोक इन तीन श्लोकों को पाठकों के लिए 'समस्त समृद्धि का धाम' कहता है।
इसके जप का सर्वोत्तम समय कब है?▼
अध्ययन से पूर्व प्रातःकाल आदर्श है, और गुरुवार विष्णु तथा विद्या के लिए विशेष रूप से शुभ हैं। कई लोग इसे नवरात्रि (सरस्वती पूजा) में व परीक्षा से पूर्व पढ़ते हैं।
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