हयग्रीव स्तोत्रम् (हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम्)
अन्य नाम / खोज: jnanananda mayam devam · hayagriva sampada stotram · hayagreeva stotram
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✦ अर्थ
हयग्रीव स्तोत्रम् भगवान विष्णु के अश्व-मुख स्वरूप हयग्रीव — ज्ञान, विद्या व वेदों के परम देव — की स्तुति है, जिन्हें विशेषकर कर्नाटक व माध्व परम्परा में पूजा जाता है। श्री वादिराज तीर्थ रचित यह संक्षिप्त सम्पूर्ण स्तोत्र विद्यार्थी व साधक वाणी की स्पष्टता, स्मरणशक्ति व अध्ययन में सफलता हेतु पढ़ते हैं। इसके तीन पवित्र श्लोक पाठकर्ता को वाणी व बुद्धि की सम्पदा का वचन देते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Composed by Sri Vadiraja Tirtha · Sri Vadiraja Tirtha · 16th century
हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम् कर्नाटक के महान माध्व संत श्री वादिराज तीर्थ ने रचा। परम्परा के अनुसार भगवान हयग्रीव — विष्णु के अश्व-मुख स्वरूप व समस्त ज्ञान के स्वामी — प्रतिदिन वादिराज का पकाए हुए चने (हयग्रीव प्रसाद) का भोग ग्रहण करने प्रकट होते थे। यह स्तोत्र हयग्रीव की समस्त विद्या के स्रोत रूप में स्तुति करता है, और इसका अन्तिम श्लोक इन तीन पवित्र श्लोकों का पाठ करने वालों को वाणी व बुद्धि की सम्पदा का वचन देता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि जो कोई भक्ति से 'हयग्रीव' नाम का जप करता है, उसकी वाणी गंगा-धारा-सी बहने लगती है और वैकुण्ठ के द्वार ही खुल जाते हैं — जैसा श्लोक वचन देते हैं, जड़ता, बुद्धि की दरिद्रता व अज्ञान दूर हो जाते हैं।
मंत्र
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ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् । आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥ १॥ हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति वादिनम् । नरं मुञ्चन्ति पापानि दरिद्रमिव योषितः ॥ २॥ हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति यो वदेत् । तस्य निःसरते वाणी जह्नुकन्या प्रवाहवत् ॥ ३॥ हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति यो ध्वनिः । विशोभते स वैकुण्ठकवाटोद्घाटनक्षमः ॥ ४॥ श्लोकत्रयमिदं पुण्यं हयग्रीवपदाङ्कितम् । वादिराजयतिप्रोक्तं पठतां सम्पदां पदम् ॥ ५॥
jñānānandamayaṃ devaṃ nirmalasphaṭikākṛtim | ādhāraṃ sarvavidyānāṃ hayagrīvamupāsmahe || 1|| hayagrīva hayagrīva hayagrīveti vādinam | naraṃ muñcanti pāpāni daridramiva yoṣitaḥ || 2|| hayagrīva hayagrīva hayagrīveti yo vadet | tasya niḥsarate vāṇī jahnukanyā pravāhavat || 3|| hayagrīva hayagrīva hayagrīveti yo dhvaniḥ | viśobhate sa vaikuṇṭhakavāṭodghāṭanakṣamaḥ || 4|| ślokatrayamidaṃ puṇyaṃ hayagrīvapadāṅkitam | vādirājayatiproktaṃ paṭhatāṃ sampadāṃ padam || 5||
अर्थ:भगवान हयग्रीव — विष्णु के अश्व-मुख स्वरूप, ज्ञान व विद्या के दाता — की स्तुति। "हम हयग्रीव की उपासना करते हैं, जो ज्ञान व आनंद के स्वरूप, निर्मल स्फटिक के समान शुद्ध, और समस्त विद्याओं के आधार हैं।" माध्व संत श्री वादिराज तीर्थ रचित यह स्तोत्र भक्तों को वाणी, बुद्धि व सम्पदा प्रदान करने वाला माना जाता है।
हयग्रीव स्तोत्रम् (हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम्) पाठ के लाभ
परम्परागत रूप से ज्ञान, विद्या, स्मृति व वाणी की स्पष्टता के लिए पढ़ा जाता है — अध्ययन व परीक्षा से पूर्व विद्यार्थियों का प्रिय।
विद्या व वाक्पटुता की 'सम्पदा' (समृद्धि) प्रदान करने वाला माना जाता है, जैसा अन्तिम श्लोक पाठकों को वचन देता है।
भक्ति व शान्त, एकाग्र मन विकसित करता है, जड़ता व संशय को दूर करता है।
संक्षिप्त व सम्पूर्ण होने से नित्य पाठ के लिए आदर्श, विशेषकर गुरुवार को व नवरात्रि तथा विजयादशमी के अध्ययन-काल में।
हयग्रीव स्तोत्रम् (हयग्रीव सम्पदा स्तोत्रम्) जप विधि
स्नान करके भगवान हयग्रीव या विष्णु की प्रतिमा के समक्ष पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाएँ, श्वास को स्थिर करें, और अर्थ पर ध्यान देते हुए स्तोत्र का धीरे-धीरे पाठ करें। विद्यार्थी प्रायः इसे अध्ययन या परीक्षा से पूर्व जपते हैं; इसे प्रतिदिन तीन बार या अधिक बार दोहराया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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