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तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् — Word-by-Word Meaning

तमीश्वराणां परमं महेश्वरम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

तम्
tam
तम् — उसे, उस (परम तत्त्व) को
ईश्वराणां परमम्
īśvarāṇāṁ paramam
ईश्वराणां परमम् — समस्त शासकों एवं नियन्ताओं में परम (श्रेष्ठ)
महेश्वरम्
maheśvaram
महेश्वरम् — महान् प्रभु (महेश्वर), सर्वोच्च स्वामी
देवतानां परमम् दैवतम्
devatānāṁ paramam daivatam
देवतानां परमम् दैवतम् — समस्त देवताओं के परम देव (दैवत)
पतिम् पतीनाम्
patiṁ patīnām
पतिम् पतीनाम् — समस्त पतियों के पति, स्वामियों के स्वामी
परमम्
paramam
परमम् — परम, सर्वोच्च
परस्तात्
parastāt
परस्तात् — परे (अव्यक्त से भी परे), परम-अतीत
विदाम
vidāma
विदाम — हम जानें, हम जान सकें, हम साक्षात्कार करें
देवम्
devam
देवम् — तेजोमय दिव्य, ज्योतिर्मय प्रभु
भुवनेशम्
bhuvaneśam
भुवनेशम् — लोकों के स्वामी, ब्रह्माण्ड के शासक
ईड्यम्
īḍyam
ईड्यम् — पूज्य, उपास्य, समस्त स्तुति के योग्य

Complete Translation

उसे हम जानें — जो ईश्वरों का परम महेश्वर है, देवताओं का परम दैवत है, पतियों का पति है, सबसे परे और परम है — उस तेजोमय दिव्य भुवनेश को, जो सर्वथा पूज्य है।

Origin & History

Source: Shvetashvatara Upanishad, Verse 6.7

Author: Traditional (Upanishadic); attributed to the sage Shvetashvatara

Period: Vedic / Upanishadic

श्वेताश्वतर उपनिषद्, जिसका नाम उस ऋषि के नाम पर है जिन्होंने इसका साक्षात्कार एवं उपदेश किया कहा जाता है, एक ब्रह्म के दर्शन को परम ईश्वर के प्रति हार्दिक भक्ति के साथ बुन देता है। अपने छठे अध्याय में ऋषि समस्त कारणों के उस कारण की स्तुति में उठते हैं, जिसके ऊपर कोई स्वामी या प्रभु नहीं। यह श्लोक उस आराधना के शिखर पर खड़ा है, जो परम ईश्वर को स्वामियों का स्वामी, देवों का देव, परम-अतीत एवं पूज्य घोषित करता है — वह, जिसे जानने हेतु साधक प्रार्थना करता है।

Frequently Asked Questions

तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'उसे हम जानें — जो ईश्वरों का परम महेश्वर, महान् स्वामी, देवों का देव है'। यह श्लोक एक परम ईश्वर (महेश्वर) को समस्त शासकों, देवताओं एवं शक्तियों से ऊपर, ब्रह्माण्ड के परम-अतीत एवं पूज्य शासक के रूप में महिमामण्डित करता है।
यह श्लोक कहाँ से आया है?
यह श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.7) से है, जो कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। श्वेताश्वतर प्रमुख उपनिषदों में सर्वाधिक भक्तिपरक है, जो एक ब्रह्म को व्यक्त परमेश्वर (ईश्वर, रुद्र, महेश्वर) के रूप में प्रस्तुत करता है।
क्या यह श्लोक शिव के विषय में है या ब्रह्म के विषय में?
श्वेताश्वतर उपनिषद् एक परम तत्त्व ब्रह्म के लिए रुद्र एवं महेश्वर जैसे नामों का प्रयोग करता है, जिसे व्यक्त परमेश्वर के रूप में देखा जाता है। भक्त इस प्रभु की उपासना शिव के रूप में कर सकते हैं, किन्तु यह श्लोक उस एक परम तत्त्व की ओर संकेत करता है जो समस्त देवताओं एवं रूपों से परे एवं उनका आधार है।
इस श्लोक का उपयोग कैसे होता है?
इसका पाठ उपासना एवं चिन्तन में एक परम ईश्वर की पुष्टि एवं स्तुति हेतु किया जाता है। 'विदाम' ('हम जानें') से आरम्भ होने वाली प्रार्थना के रूप में, इसका उपयोग भक्ति एवं दिव्यता को ब्रह्माण्ड के परम शासक एवं लक्ष्य के रूप में साक्षात्कार करने की आकांक्षा दोनों को गहन करने हेतु होता है।

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