जगन्नाथ स्तोत्रम् (नीलाचलनिवासाय) — Word-by-Word Meaning
जगन्नाथ स्तोत्रम् (नीलाचलनिवासाय)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
Complete Translation
नीलाचल (नीले पर्वत) पुरी के भगवान जगन्नाथ की, अपने भाई-बहन बलभद्र व सुभद्रा सहित, शरणागति की प्रिय प्रार्थना — "हे नित्य परमात्मा, नीलाचलवासी, आपको नमस्कार। आप अनाथों के नाथ हैं; जिसका स्वामी जगन्नाथ हो उसे दुःख कैसे? द्रौपदी की रक्षा व गजेन्द्र-मोक्ष में जो शीघ्रता थी, हे करुणामूर्ति, वह अब कहाँ चली गई?"
Origin & History
Source: Traditional Jagannatha stotra
Author: Traditional
Period: Classical
भगवान जगन्नाथ — 'जगत् के स्वामी', कृष्ण/विष्णु का स्वरूप, जिनकी पूजा उनके बड़े भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा सहित होती है — ओडिशा के पुरी के बारहवीं शताब्दी के महामन्दिर में विराजमान हैं, जो नीलाचल या नीलगिरि, अर्थात् नीला पर्वत कहलाता है। शरणागति का यह स्तोत्र ओडिशा व उससे परे पठित होता है; इसके श्लोक प्रभु को द्रौपदी व गजेन्द्र पर उनकी शीघ्र कृपा का प्रेमपूर्वक स्मरण कराते हैं और वही करुणा माँगते हैं।
Frequently Asked Questions
जगन्नाथ स्तोत्रम् (नीलाचलनिवासाय) क्या है?▼
यह पुरी के भगवान जगन्नाथ की एक लघु, अत्यन्त प्रिय संस्कृत शरणागति-स्तुति है, जो 'नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने' से आरम्भ होती है। यह नीलाचल (नीला पर्वत, पुरी) में बलभद्र व सुभद्रा सहित विराजमान प्रभु को नमस्कार करती है और उनकी रक्षा की प्रार्थना करती है।
यह प्रार्थना द्रौपदी व गजेन्द्र का उल्लेख क्यों करती है?▼
'या त्वरा द्रौपदीत्राणे' श्लोक प्रभु को उस शीघ्रता का स्मरण कराता है जिससे उन्होंने कभी द्रौपदी के सम्मान की रक्षा की थी और गजेन्द्र हाथी को मगर से मुक्त किया था — और प्रेमपूर्वक उनसे प्रार्थना करता है कि वे अब भक्त पर भी वही शीघ्र करुणा दिखाएँ।
इसका पाठ कब करना सर्वोत्तम है?▼
इसका पाठ नित्य किया जा सकता है; यह एकादशी व गुरुवार को, तथा पुरी रथयात्रा व जगन्नाथ उत्सवों के समय, और पुरी धाम के दर्शनार्थियों को विशेष प्रिय है।
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