जगन्नाथ स्तोत्रम् (नीलाचलनिवासाय)
अन्य नाम / खोज: nilachala nivasaya nityaya paramatmane · jagannath stotram · anathasya jagannatha
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✦ अर्थ
यह भगवान जगन्नाथ — ओडिशा के पुरी महामन्दिर में बलभद्र व सुभद्रा सहित विराजमान विष्णु (कृष्ण) स्वरूप — की सबसे प्रिय संस्कृत प्रार्थनाओं में से एक है। शरणागति (प्रपत्ति) के ये श्लोक प्रभु को स्मरण कराते हैं कि उन्होंने द्रौपदी व गजेन्द्र की कितनी शीघ्र रक्षा की थी, और भक्त को पूर्णतः उनकी शरण में रखते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Jagannatha stotra · Traditional · Classical
भगवान जगन्नाथ — 'जगत् के स्वामी', कृष्ण/विष्णु का स्वरूप, जिनकी पूजा उनके बड़े भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा सहित होती है — ओडिशा के पुरी के बारहवीं शताब्दी के महामन्दिर में विराजमान हैं, जो नीलाचल या नीलगिरि, अर्थात् नीला पर्वत कहलाता है। शरणागति का यह स्तोत्र ओडिशा व उससे परे पठित होता है; इसके श्लोक प्रभु को द्रौपदी व गजेन्द्र पर उनकी शीघ्र कृपा का प्रेमपूर्वक स्मरण कराते हैं और वही करुणा माँगते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्त मानते हैं कि जो इस प्रार्थना से भगवान जगन्नाथ की शरण लेता है उसे कभी दुःख का भय नहीं रहता — क्योंकि, जैसा श्लोक कहता है, जिसके स्वामी स्वयं जगत् के स्वामी हों उसे शोक कैसे छू सकता है?
मंत्र
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नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने । बलभद्रसुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः ॥ १॥ जगदानन्दकन्दाय प्रणतार्तिहराय च । नीलाचलनिवासाय जगन्नाथाय ते नमः ॥ २॥ अनाथस्य जगन्नाथ नाथस्त्वं मे न संशयः । यस्य नाथो जगन्नाथस्तस्य दुःखं कथं प्रभो ॥ ३॥ या त्वरा द्रौपदीत्राणे या त्वरा गजमोक्षणे । मय्यार्ते करुणामूर्ते सा त्वरा क्व गता हरे ॥ ४॥ मत्समो पातकी नास्ति त्वत्समो नास्ति पापहा । इति विज्ञाय देवेश यथायोग्यं तथा कुरु ॥ ५॥
nīlācalanivāsāya nityāya paramātmane | balabhadrasubhadrābhyāṃ jagannāthāya te namaḥ || 1|| jagadānandakandāya praṇatārtiharāya ca | nīlācalanivāsāya jagannāthāya te namaḥ || 2|| anāthasya jagannātha nāthastvaṃ me na saṃśayaḥ | yasya nātho jagannāthastasya duḥkhaṃ kathaṃ prabho || 3|| yā tvarā draupadītrāṇe yā tvarā gajamokṣaṇe | mayyārte karuṇāmūrte sā tvarā kva gatā hare || 4|| matsamo pātakī nāsti tvatsamo nāsti pāpahā | iti vijñāya deveśa yathāyogyaṃ tathā kuru || 5||
अर्थ:नीलाचल (नीले पर्वत) पुरी के भगवान जगन्नाथ की, अपने भाई-बहन बलभद्र व सुभद्रा सहित, शरणागति की प्रिय प्रार्थना — "हे नित्य परमात्मा, नीलाचलवासी, आपको नमस्कार। आप अनाथों के नाथ हैं; जिसका स्वामी जगन्नाथ हो उसे दुःख कैसे? द्रौपदी की रक्षा व गजेन्द्र-मोक्ष में जो शीघ्रता थी, हे करुणामूर्ति, वह अब कहाँ चली गई?"
जगन्नाथ स्तोत्रम् (नीलाचलनिवासाय) पाठ के लाभ
शरणागति (पूर्ण समर्पण) की प्रार्थना — स्वयं को पूर्णतः भगवान जगन्नाथ की रक्षा में रखने के लिए पठित।
द्रौपदी व गजेन्द्र की प्रभु द्वारा की गई शीघ्र रक्षा का स्मरण कराते हुए दुःख, भय व असहायता को दूर करने वाली कही जाती है।
रथयात्रा और एकादशी पर तथा पुरी धाम के तीर्थयात्रियों को विशेष प्रिय।
छोटी व सरलता से कण्ठस्थ होने वाली, भक्ति सहित नित्य पाठ के योग्य।
जगन्नाथ स्तोत्रम् (नीलाचलनिवासाय) जप विधि
स्नान करके भगवान जगन्नाथ की छवि के समक्ष पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाएँ और समर्पित हृदय से श्लोकों का धीरे-धीरे पाठ करें। इसका पाठ नित्य किया जा सकता है, और एकादशी, गुरुवार तथा पुरी रथयात्रा के समय विशेष शुभ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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