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जगन्नाथाष्टकम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या संध्या; विशेषकर गुरुवार और एकादशी·📜 Ascribed to Adi Shankaracharya

अन्य नाम / खोज: kadacitkalinditatavipinasangitakaravo kavaro · jagannathashtakam lyrics

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अर्थ

जगन्नाथाष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा पुरी के भगवान जगन्नाथ की स्तुति में रचित आठ श्लोकों का स्तोत्र है। प्रत्येक श्लोक 'जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे' — वही जगन्नाथ स्वामी मेरे नयनपथ में आएँ — से समाप्त होता है। पूर्वी सागर के तट पर स्थित महान मंदिर का यह अति प्रिय स्तोत्र है।

उत्पत्ति और कथा

Ascribed to Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · Classical

जगन्नाथाष्टकम् परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य द्वारा रचित मानी जाती है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित पुरी के भगवान जगन्नाथ की आठ श्लोकों की स्तुति, जिनमें प्रत्येक 'वही जगन्नाथ स्वामी मेरे नयनपथ में आएँ' से समाप्त होता है। पूर्वी सागर के महान मंदिर का अति प्रिय स्तोत्र।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से जगन्नाथाष्टकम् का पाठ करना भगवान की कृपा के निकट पहुँचना है, जो प्रेमपूर्वक पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागते।

मंत्र

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कदाचित्कालिन्दीतटविपिनसङ्गीतकरवो कवरो मुदा गोपीनारीवदनकमलास्वादमधुपः भीरी रमाशम्भुब्रह्मामरपतिगणेशार्चितपदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिंछं कटितटे पिच्छिं दुकूलं नेत्रान्ते सहचरकटाक्षं विदधते सदा श्रीमद्वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नीलशिखरे वसन् प्रासादान्तस्सहजबलभद्रेण बलिना सुभद्रामध्यस्थस्सकलसुरसेवावसरदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे कृपापारावारास्सजलजलदश्रेणिरुचिरो रमावाणीसौमस्सुरदमलपद्मोद्भवमुखैः वाणीरामस् सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे रथारूढो गच्छन् पथि मिलितभूदेवपटलैः स्तुतिप्रादुर्भावं प्रतिपद मुपाकर्ण्य सदयः दयासिन्धुर्बन्धुस्सकलजगता सिन्धुसुतया जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे परब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि रसानन्दो राधासरसवपुरालिङ्गनसखो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे वै प्रार्थ्यं राज्यं कनकतां भोगविभवं याचेऽहं रम्यां निखिलजनकाम्यां वरवधूम् सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चितपदं जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे इति श्रीमद् शङ्कराचार्यप्रणीतं जगन्नाथाष्टकं सम्पूर्णं॥

kadācitkālindītaṭavipinasaṅgītakaravo kavaro mudā gopīnārīvadanakamalāsvādamadhupaḥ | bhīrī ramāśambhubrahmāmarapatigaṇeśārcitapado jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 1 || bhuje savye veṇuṃ śirasi śikhipiṃchaṃ kaṭitaṭe picchiṃ dukūlaṃ netrānte sahacarakaṭākṣaṃ vidadhate | sadā śrīmadvṛndāvanavasatilīlāparicayo jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 2 || mahāmbhodhestīre kanakarucire nīlaśikhare vasan prāsādāntassahajabalabhadreṇa balinā | subhadrāmadhyasthassakalasurasevāvasarado jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 3 || kṛpāpārāvārāssajalajaladaśreṇiruciro ramāvāṇīsaumassuradamalapadmodbhavamukhaiḥ | vāṇīrāmas surendrairārādhyaḥ śrutigaṇaśikhāgītacarito jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 4 || rathārūḍho gacchan pathi militabhūdevapaṭalaiḥ stutiprādurbhāvaṃ pratipada mupākarṇya sadayaḥ | dayāsindhurbandhussakalajagatā sindhusutayā jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 5 || parabrahmāpīḍaḥ kuvalayadalotphullanayano nivāsī nīlādrau nihitacaraṇo'nantaśirasi | rasānando rādhāsarasavapurāliṅganasakho jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 6 || na vai prārthyaṃ rājyaṃ na ca kanakatāṃ bhogavibhavaṃ na yāce'haṃ ramyāṃ nikhilajanakāmyāṃ varavadhūm | sadā kāle kāle pramathapatinā gītacarito jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 7 || hara tvaṃ saṃsāraṃ drutataramasāraṃ surapate hara tvaṃ pāpānāṃ vitatimaparāṃ yādavapate | aho dīnānāthaṃ nihitamacalaṃ niścitapadaṃ jagannāthaḥ svāmī nayanapathagāmī bhavatu me || 8 || iti śrīmad śaṅkarācāryapraṇītaṃ jagannāthāṣṭakaṃ sampūrṇaṃ||

अर्थ:आदि शंकराचार्य रचित पुरी के भगवान जगन्नाथ की आठ श्लोकों की स्तुति, जिनमें प्रत्येक "वही जगन्नाथ स्वामी मेरे नयनपथ में आएँ" से समाप्त होता है। पूर्वी सागर के महान मंदिर का अति प्रिय स्तोत्र।

जगन्नाथाष्टकम् पाठ के लाभ

जगन्नाथाष्टकम् का पाठ भगवान की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करने वाला माना जाता है।

भक्ति बढ़ाता है, मन को शांत करता है और हृदय को भगवान के स्मरण में स्थिर करता है।

गुरुवार और एकादशी को तथा एकादशी एवं विष्णु के पर्वों पर इसका पाठ सर्वाधिक शुभ है।

एक छोटा, मधुर स्तोत्र जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धा सहित प्रतिदिन पाठ कर सकता है।

जगन्नाथाष्टकम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या संध्या; विशेषकर गुरुवार और एकादशी
दिशाEast or North

स्नान करके देवता की प्रतिमा के सामने पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाकर जगन्नाथाष्टकम् का धीरे-धीरे और भक्ति सहित पाठ करें। इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, अथवा विशेष रूप से एकादशी और विष्णु के पर्वों पर। अंत में कृपा और रक्षा की प्रार्थना के साथ समाप्त करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित पुरी के भगवान जगन्नाथ की आठ श्लोकों की स्तुति, जिनमें प्रत्येक 'वही जगन्नाथ स्वामी मेरे नयनपथ में आएँ' से समाप्त होता है। पूर्वी सागर के महान मंदिर का अति प्रिय स्तोत्र।
यह आदि शंकराचार्य को समर्पित है। इसका पाठ प्रातः या संध्या समय श्रद्धा सहित किया जाता है, और विशेष रूप से गुरुवार तथा एकादशी को एवं एकादशी और विष्णु के पर्वों पर।

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