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जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी — Word-by-Word Meaning

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अपि
api
अपि — यद्यपि, चाहे
स्वर्णमयी
svarṇamayī
स्वर्णमयी — स्वर्ण से बनी, सोने की
लङ्का
laṅkā
लंका — लंका (रावण की स्वर्ण-नगरी)
न मे रोचते
na me rocate
न मे रोचते — मुझे अच्छी नहीं लगती, मुझे नहीं भाती
लक्ष्मण
lakṣmaṇa
लक्ष्मण — हे लक्ष्मण (राम के भ्राता)
जननी
jananī
जननी — माता, जननी
जन्मभूमिः
janma-bhūmiḥ
जन्मभूमिः — जन्मभूमि, मातृभूमि
ca
च — और
स्वर्गात्
svargāt
स्वर्गात् — स्वर्ग से
अपि
api
अपि — भी
गरीयसी
garīyasī
गरीयसी — बढ़कर, अधिक भारी, अधिक पूज्य

Complete Translation

हे लक्ष्मण! यह स्वर्णमयी लंका भी मुझे अच्छी नहीं लगती; क्योंकि जननी (माता) और जन्मभूमि तो स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। स्वर्ण-लंका की विजय के पश्चात् भगवान राम के ये वचन घोषित करते हैं कि कोई भी वैभव, चाहे कितना ही चकाचौंध भरा हो, माता और मातृभूमि के प्रति प्रेम से बढ़कर नहीं हो सकता।

Origin & History

Source: Ramayana tradition (Subhashita)

Author: Attributed to the Ramayana tradition

Period: Ancient itihasa / classical Sanskrit tradition

रावण को पराजित करने एवं स्वर्ण-नगरी लंका के समक्ष खड़े होने के पश्चात्, कहा जाता है कि लक्ष्मण ने उसके वैभव की प्रशंसा की और वहीं रुक जाने का विचार किया। राम ने इस श्लोक से उत्तर दिया, यह घोषित करते हुए कि स्वर्ण की लंका भी उनके लिए कोई आकर्षण नहीं रखती, क्योंकि उनकी माता एवं उनकी जन्मभूमि अयोध्या स्वर्ग से भी अधिक प्रिय एवं महान हैं। तब से यह श्लोक मातृभूमि के प्रति प्रेम की सर्वाधिक उद्धृत संस्कृत अभिव्यक्ति बन गया है।

Frequently Asked Questions

जननी जन्मभूमिश्च श्लोक किसने कहा था?
यह परम्परागत रूप से भगवान राम के मुख से माना जाता है, जो उन्होंने रावण पर विजय के पश्चात् अपने भ्राता लक्ष्मण से कहा, जब स्वर्ण-नगरी लंका उनके सामने थी। राम घोषित करते हैं कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं, और स्वर्णमयी लंका भी उन्हें नहीं भाती।
'स्वर्गादपि गरीयसी' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'स्वर्ग से भी बढ़कर (या अधिक भारी)।' श्लोक इसका प्रयोग यह कहने के लिए करता है कि अपनी माता और अपनी मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक पूज्य एवं प्रिय हैं — भारतीय परम्परा में सर्वोच्च प्रशंसा।
यह श्लोक भारत में इतना प्रसिद्ध क्यों है?
क्योंकि यह एक ही सुन्दर पंक्ति में अपनी माता एवं मातृभूमि के प्रति प्रेम एवं कर्तव्य के गहन भारतीय आदर्श को व्यक्त करता है। इसे देशभक्ति, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अवसरों पर अपनी जड़ों के प्रति समर्पण के सार के रूप में व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है।

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