करचरणकृतं — क्षमा प्रार्थना — Word-by-Word Meaning
करचरणकृतं — क्षमा प्रार्थना
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
Karacharanakritam vakkayajam karmajam va
हाथ, पैर, वाणी, शरीर या कर्म से किया हुआ जो भी अपराध
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्
Shravananayanajam va manasam vaparadham
अथवा कान, नेत्र या मन से किया हुआ — कोई भी अपराध
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
Vihitamavihitam va sarvametat kshamasva
विहित हो या अविहित — इस सबको क्षमा कीजिए
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो
Jaya jaya karunabdhe shrimahadeva shambho
जय हो, जय हो, हे करुणा के सागर, श्री महादेव शम्भो!
Complete Translation
हाथ, पैर, वाणी, शरीर या कर्म से, अथवा कान, नेत्र या मन से किया हुआ — विहित या अविहित — मेरा जो भी अपराध हो, उस सबको क्षमा कीजिए; हे करुणा के सागर, श्री महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो।
Origin & History
Source: Traditional kshama-prarthana (closing prayer of worship)
Author: Traditional
Period: Classical
यह प्रिय श्लोक हिन्दू उपासना का पारंपरिक समापन है — प्रत्येक पूजा के अंत में भगवान को अर्पित क्षमा की विनम्र प्रार्थना। यह स्वीकार करते हुए कि कोई मानवीय उपासना त्रुटि से रहित नहीं हो सकती, भक्त शरीर, वाणी और मन के हर दोष को 'करुणा के सागर' के चरणों में रख देता है, इस विश्वास के साथ कि सच्चा प्रेम अर्पण को पूर्ण बना देता है। प्रायः महादेव (शिव) को संबोधित यह श्लोक अनुष्ठान को पूर्ण करने हेतु विश्व भर में पढ़ा जाता है।
Frequently Asked Questions
करचरणकृतं प्रार्थना किसलिए है?▼
यह क्षमा-प्रार्थना है — उपासना के अंत में पढ़ी जाने वाली क्षमा की प्रार्थना। यह भगवान से हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कान, नेत्र या मन से किए हर दोष को क्षमा करने की प्रार्थना करती है, चाहे विहित हो या अविहित, जाने या अनजाने, और किसी भी त्रुटि के बावजूद पूजा को पूर्ण करती है।
इसे कब पढ़ा जाता है?▼
सदा पूजा, हवन, आरती या नित्य प्रार्थना के अंत में, अंतिम अर्पण के रूप में — उपासना की समस्त कमियों को भगवान की करुणा को समर्पित करते हुए।
क्या इसे शिव के अतिरिक्त अन्य देवों को अर्पित किया जा सकता है?▼
हाँ। यह श्लोक सार्वभौमिक है; केवल अंतिम आह्वान बदलता है। शिव के लिए यह 'श्री महादेव शम्भो' से समाप्त होता है; विष्णु/कृष्ण के भक्तों के लिए यह 'श्री माधव' अथवा 'करुणाब्धे श्री कृष्ण' जैसे नामों से समाप्त होता है।
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