दशावतार स्तोत्रम् — प्रलयपयोधिजले (जयदेव) — Word-by-Word Meaning
दशावतार स्तोत्रम् — प्रलयपयोधिजले (जयदेव)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
Complete Translation
गीत गोविन्द से जयदेव रचित भगवान विष्णु के दश अवतारों (दशावतार) की प्रसिद्ध स्तुति — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध व कल्कि रूपों का वंदन, प्रत्येक श्लोक के अंत में 'जय जगदीश हरे' — हे जगत् के स्वामी हरि, आपकी जय हो!
Origin & History
Source: Gita Govinda by Jayadeva
Author: Jayadeva
Period: 12th century
जयदेव, राजा लक्ष्मण सेन के राजकवि और ओडिशा के केन्दुली (केन्दुबिल्व) के निवासी, ने गीत गोविन्द की रचना की — जो संस्कृत भक्ति काव्य की सर्वोत्तम कृतियों में से एक है। इसका आरंभिक दशावतार स्तोत्र, 'प्रलयपयोधिजले', विष्णु के दश अवतारों की स्तुति करता है और सदियों से पुरी में भगवान जगन्नाथ की सेवा में गाया जाता रहा है, जिसने इसे ओडिशा और समस्त वैष्णवों के सर्वाधिक प्रिय स्तोत्रों में से एक बना दिया है।
Frequently Asked Questions
'प्रलयपयोधिजले' दशावतार स्तोत्रम् क्या है?▼
यह जयदेव की भगवान विष्णु के दश अवतारों — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध व कल्कि — की प्रसिद्ध स्तुति है, जो गीत गोविन्द से ली गई है और 'प्रलयपयोधिजले' से आरंभ होती है। प्रत्येक श्लोक 'केशव धृत... जय जगदीश हरे' टेक के साथ समाप्त होता है।
इसकी रचना किसने की?▼
इसकी रचना जयदेव (१२वीं शताब्दी) ने की, जो ओडिशा के केन्दुली के महान संस्कृत कवि थे, अपनी काव्य कृति गीत गोविन्द के अंश के रूप में। यह पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ के समक्ष प्रतिदिन गाई जाती है और ओडिआ भक्ति परंपरा की धरोहर है।
किन दश अवतारों की स्तुति की गई है, और कृष्ण के स्थान पर बलराम क्यों?▼
दश अवतार हैं मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध व कल्कि। इस वैष्णव (और विशेष रूप से गौड़ीय/ओडिआ) सूची में बलराम को दश में गिना जाता है और कृष्ण को सभी अवतारों का स्रोत (स्वयं भगवान) माना जाता है, न कि केवल उनमें से एक।
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