दशावतार स्तोत्रम् — प्रलयपयोधिजले (जयदेव)
अन्य नाम / खोज: pralaya payodhi jale · jaya jagadisha hare · dashavatar stotram jayadeva · gita govinda dashavatara
✦ अर्थ
यह दशावतार स्तोत्र ('प्रलयपयोधिजले') ओडिशा के केन्दुबिल्व (केन्दुली) के महाकवि जयदेव ने अपने गीत गोविन्द में रचा। यह विष्णु के दश अवतारों की उत्कृष्ट संस्कृत में स्तुति करता है और पुरी में भगवान जगन्नाथ के समक्ष प्रतिदिन गाया जाता है। यह ओडिआ व समस्त भारतीय भक्ति की धरोहर है, जो हर युग में भगवान की रक्षा हेतु गाया जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Gita Govinda by Jayadeva · Jayadeva · 12th century
जयदेव, राजा लक्ष्मण सेन के राजकवि और ओडिशा के केन्दुली (केन्दुबिल्व) के निवासी, ने गीत गोविन्द की रचना की — जो संस्कृत भक्ति काव्य की सर्वोत्तम कृतियों में से एक है। इसका आरंभिक दशावतार स्तोत्र, 'प्रलयपयोधिजले', विष्णु के दश अवतारों की स्तुति करता है और सदियों से पुरी में भगवान जगन्नाथ की सेवा में गाया जाता रहा है, जिसने इसे ओडिशा और समस्त वैष्णवों के सर्वाधिक प्रिय स्तोत्रों में से एक बना दिया है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि इस एक स्तोत्र में सभी दश अवतारों की लीलाओं को गाना भगवान के हर उस रूप की शरण लेना है, जिसे वे धर्म की रक्षा के लिए धारण करते हैं — युग-युग, 'जय जगदीश हरे'।
मंत्र
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प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहितवहित्रचरित्रमखेदम् । केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ १॥ क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे । केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥ २॥ वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना । केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ॥ ३॥ तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गं दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् । केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥ ४॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन पदनखनीरजनितजनपावन । केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥ ५॥ क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापं स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् । केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥ ६॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयं दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् । केशव धृतरामशरीर जय जगदीश हरे ॥ ७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभं हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् । केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥ ८॥ निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं सदयहृदयदर्शितपशुघातम् । केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥ ९॥ म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालं धूमकेतुमिव किमपि करालम् । केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥ १०॥ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारं शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् । केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ॥ ११॥
pralayapayodhijale dhṛtavānasi vedaṃ vihitavahitracaritramakhedam | keśava dhṛtamīnaśarīra jaya jagadīśa hare || 1|| kṣitirativipulatare tava tiṣṭhati pṛṣṭhe dharaṇidharaṇakiṇacakragariṣṭhe | keśava dhṛtakacchaparūpa jaya jagadīśa hare || 2|| vasati daśanaśikhare dharaṇī tava lagnā śaśini kalaṅkakaleva nimagnā | keśava dhṛtasūkararūpa jaya jagadīśa hare || 3|| tava karakamalavare nakhamadbhutaśṛṅgaṃ dalitahiraṇyakaśiputanubhṛṅgam | keśava dhṛtanaraharirūpa jaya jagadīśa hare || 4|| chalayasi vikramaṇe balimadbhutavāmana padanakhanīrajanitajanapāvana | keśava dhṛtavāmanarūpa jaya jagadīśa hare || 5|| kṣatriyarudhiramaye jagadapagatapāpaṃ snapayasi payasi śamitabhavatāpam | keśava dhṛtabhṛgupatirūpa jaya jagadīśa hare || 6|| vitarasi dikṣu raṇe dikpatikamanīyaṃ daśamukhamaulibaliṃ ramaṇīyam | keśava dhṛtarāmaśarīra jaya jagadīśa hare || 7|| vahasi vapuṣi viśade vasanaṃ jaladābhaṃ halahatibhītimilitayamunābham | keśava dhṛtahaladhararūpa jaya jagadīśa hare || 8|| nindasi yajñavidherahaha śrutijātaṃ sadayahṛdayadarśitapaśughātam | keśava dhṛtabuddhaśarīra jaya jagadīśa hare || 9|| mlecchanivahanidhane kalayasi karavālaṃ dhūmaketumiva kimapi karālam | keśava dhṛtakalkiśarīra jaya jagadīśa hare || 10|| śrījayadevakaveridamuditamudāraṃ śṛṇu sukhadaṃ śubhadaṃ bhavasāram | keśava dhṛtadaśavidharūpa jaya jagadīśa hare || 11||
अर्थ:गीत गोविन्द से जयदेव रचित भगवान विष्णु के दश अवतारों (दशावतार) की प्रसिद्ध स्तुति — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध व कल्कि रूपों का वंदन, प्रत्येक श्लोक के अंत में 'जय जगदीश हरे' — हे जगत् के स्वामी हरि, आपकी जय हो!
दशावतार स्तोत्रम् — प्रलयपयोधिजले (जयदेव) पाठ के लाभ
एक ही स्तोत्र में विष्णु के सभी दश अवतारों की महिमा गाता है — हर युग और परिस्थिति में भगवान की रक्षा और कृपा हेतु पाठ किया जाता है।
जयदेव के गीत गोविन्द की एक उत्कृष्ट कृति, जो पुरी के जगन्नाथ मंदिर में प्रतिदिन गाई जाती है और ओडिशा तथा संपूर्ण भारत में प्रिय है।
गहरी भक्ति और भगवान की लीलाओं के स्मरण को बढ़ाता है; मधुर और कीर्तन में प्रिय।
एकादशी, जन्माष्टमी, राम नवमी तथा विष्णु पर्वों के समय विशेष रूप से शुभ।
दशावतार स्तोत्रम् — प्रलयपयोधिजले (जयदेव) जप विधि
स्नान करके भगवान विष्णु या जगन्नाथ की मूर्ति के समक्ष पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीपक जलाएं और दश श्लोकों को मधुरता से गाएं या पाठ करें, प्रत्येक अवतार पर मन को टिकाते हुए, प्रत्येक का 'जय जगदीश हरे' से समापन करें। इसे प्रायः कीर्तन के रूप में गाया जाता है और एकादशी को विशेष रूप से प्रिय है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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