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सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा — Word-by-Word Meaning

सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

सा
वह (भक्ति — संस्कृत में स्त्रीलिंग, जिसका विषय प्रथम सूत्र में घोषित हुआ था)
तु
tu
किन्तु, वस्तुतः (सच्ची भक्ति को मात्र कर्मकाण्ड या भावुकता से अलग करने वाला बलदायक अव्यय)
अस्मिन्
asmin
उसमें, उसके प्रति (भगवान, ईश्वर)
परम
parama
परम, सर्वोच्च, चरम
प्रेम
prema
प्रेम (निःस्वार्थ, गहन प्रेम — कामना या आसक्ति नहीं)
रूपा
rūpā
स्वरूप वाली, जिसका रूप हो (स्त्रीलिंग, सा/भक्ति से मेल खाती हुई)
परमप्रेमरूपा
parama-prema-rūpā
परम प्रेम के स्वरूप वाली — भक्ति की परिभाषा भगवान के प्रति सर्वोच्च प्रेम के रूप में की गई है
सा तु
sā tu
वह (भक्ति) तो — प्रथम सूत्र से 'भक्ति' विषय को लेकर अब उसकी परिभाषा देने के लिए
अमृत
amṛta
अमरता, अमृत — मृत्युरहित, आनन्दमय सत्ता का अमृत
स्वरूपा च
svarūpā ca
और उसी के स्वरूप वाली — सूत्र ३, यह घोषणा कि भक्ति स्वयं अमरता के स्वरूप वाली है
अमृतस्वरूपा च
amṛta-svarūpā ca
और वह अमृत-स्वरूपा है — इसे प्राप्त करके भक्त अमर आनन्द का भागी होता है

Complete Translation

वह (भक्ति) तो उस (भगवान) के प्रति परम प्रेम के स्वरूप वाली है। (२) और वह अमृत-स्वरूपा (अमरता एवं आनन्द के स्वरूप वाली) है। (३)

Origin & History

Source: Narada Bhakti Sutra, Sutra 2

Author: Attributed to Devarshi Narada

Period: Ancient (classical period of the Bhakti tradition)

प्रथम सूत्र में भक्ति के व्याख्यान की घोषणा करने के तुरन्त बाद, देवर्षि नारद इस द्वितीय सूत्र में भक्ति की परिभाषा ही दे देते हैं — वह भगवान के प्रति परम प्रेम (परम-प्रेम) के स्वरूप वाली है। इसके आगे ग्रन्थ इस प्रेम के लक्षण बताता है — कि इसे पाकर मनुष्य सिद्ध, अमर और पूर्ण तृप्त हो जाता है; कि यह कामना से नहीं मापा जा सकता क्योंकि यह स्वयं अपनी पूर्ति है; और यह कर्म तथा ज्ञान के मार्गों से भी बढ़कर है। इसलिए यह सूत्र नारद के उपदेश का हृदय माना जाता है, जो घोषित करता है कि भक्ति स्वयं प्रेम ही है।

Frequently Asked Questions

'सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'वह (भक्ति) उस (भगवान) के प्रति परम प्रेम के स्वरूप वाली है।' यह नारद भक्ति सूत्र का द्वितीय सूत्र है और भक्ति की मूल परिभाषा देता है — भगवान के प्रति सर्वोच्च, निःस्वार्थ प्रेम।
भक्ति को 'परम-प्रेम' (सर्वोच्च प्रेम) क्यों कहा गया है?
क्योंकि सच्ची भक्ति भय, कर्तव्य या फल की कामना से प्रेरित नहीं होती, अपितु भगवान के लिए ही भगवान से प्रेम है। 'परम' का अर्थ है सर्वोच्च, और 'प्रेम' का अर्थ है निःस्वार्थ प्रेम — अतः भक्ति प्रेम का शुद्धतम और सर्वोच्च रूप है।
यह सूत्र प्रथम सूत्र से कैसे जुड़ता है?
प्रथम सूत्र ('अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः') घोषणा करता है कि अब भक्ति का व्याख्यान होगा। यह द्वितीय सूत्र तुरन्त उसकी परिभाषा देता है — वह भक्ति (सा) भगवान के प्रति परम प्रेम के स्वरूप वाली है। दोनों मिलकर विषय का नाम और उसका सार देकर ग्रन्थ का आरम्भ करते हैं।
यहाँ 'सा' (वह) शब्द का प्रयोग कैसे हुआ है?
संस्कृत में भक्ति शब्द व्याकरण की दृष्टि से स्त्रीलिंग है, इसलिए उसे 'सा' (वह) कहा गया है। सम्पूर्ण परिभाषा — परमप्रेमरूपा — भक्ति से मेल खाने के लिए स्त्रीलिंग में है।

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