सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा
अन्य नाम / खोज: sa tu asmin parama prema rupa · narada bhakti sutra 2 · parama prema rupa · definition of bhakti narada
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✦ अर्थ
नारद भक्ति सूत्र का यह द्वितीय सूत्र भक्ति की मूल परिभाषा देता है — वह भगवान के प्रति परम प्रेम के स्वरूप वाली है। प्रथम सूत्र में भक्ति के व्याख्यान की घोषणा करने के पश्चात् देवर्षि नारद अब उसका मर्म प्रकट करते हैं — यह कर्मकाण्ड, भय या किसी सौदे का नाम नहीं, अपितु भगवान के प्रति परम निःस्वार्थ प्रेम है; और तृतीय सूत्र जोड़ता है कि यह भक्ति अमृत-स्वरूपा है। ये पंक्तियाँ सम्पूर्ण भक्ति-परम्परा की इस समझ की आधारशिला हैं कि भक्ति स्वयं प्रेमस्वरूप है।
उत्पत्ति और कथा
Narada Bhakti Sutra, Sutra 2 · Attributed to Devarshi Narada · Ancient (classical period of the Bhakti tradition)
प्रथम सूत्र में भक्ति के व्याख्यान की घोषणा करने के तुरन्त बाद, देवर्षि नारद इस द्वितीय सूत्र में भक्ति की परिभाषा ही दे देते हैं — वह भगवान के प्रति परम प्रेम (परम-प्रेम) के स्वरूप वाली है। इसके आगे ग्रन्थ इस प्रेम के लक्षण बताता है — कि इसे पाकर मनुष्य सिद्ध, अमर और पूर्ण तृप्त हो जाता है; कि यह कामना से नहीं मापा जा सकता क्योंकि यह स्वयं अपनी पूर्ति है; और यह कर्म तथा ज्ञान के मार्गों से भी बढ़कर है। इसलिए यह सूत्र नारद के उपदेश का हृदय माना जाता है, जो घोषित करता है कि भक्ति स्वयं प्रेम ही है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्ति-परम्परा के सन्त घोषित करते हैं कि जब भगवान के प्रति यह परम प्रेम (प्रेम) जाग उठता है, तो भक्त को और किसी वस्तु की कामना नहीं रहती — न मुक्ति की, न किसी सांसारिक वस्तु की — क्योंकि प्रेम स्वयं अपना पुरस्कार है, और उस प्रेम में वे भगवान, जो अन्यथा पहुँच से परे हैं, अपने प्रेमी के सम्मुख स्वयं को प्रकट कर देते हैं।
मंत्र
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सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा ॥ २ ॥ अमृतस्वरूपा च ॥ ३ ॥
sā tv asmin parama-prema-rūpā (2) amṛta-svarūpā ca (3)
अर्थ:वह (भक्ति) तो उस (भगवान) के प्रति परम प्रेम के स्वरूप वाली है। (२) और वह अमृत-स्वरूपा (अमरता एवं आनन्द के स्वरूप वाली) है। (३)
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा पाठ के लाभ
भक्ति का निश्चित अर्थ देता है — भगवान के प्रति परम, निःस्वार्थ प्रेम — जो भक्ति-मार्ग का सार है।
भक्ति को कर्मकाण्ड, भय और कामना से ऊपर उठाकर उसे शुद्ध प्रेम (प्रेम) के रूप में प्रकट करता है।
भक्त इसका चिन्तन करते हैं ताकि उपासना का उद्देश्य शुद्ध होकर केवल प्रेम शेष रहे।
नारद भक्ति सूत्र के अध्ययन में पाठ किया जाने वाला आधारभूत सूत्र।
भगवत्-प्रेम (प्रेम) की उस अभिलाषा को जगाता है जिसे सन्त सर्वोच्च निधि कहते हैं।
हृदय को स्मरण कराता है कि समस्त आध्यात्मिक प्रयास का लक्ष्य ईश्वर-प्रेम है।
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा जप विधि
इस सूत्र का पाठ धीरे-धीरे करें, 'परम-प्रेम' (सर्वोच्च प्रेम) शब्दों पर ठहरते हुए। मन को यह समझने दें कि सच्ची भक्ति स्वार्थ रहित होकर भगवान की ओर उमड़ने वाले सर्वोच्च प्रेम के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आरम्भिक सूत्र के पश्चात् इस पर मनन करें, इसे अपनी उपासना का मानदण्ड और अभिलाषा बनने दें। इसे मार्गदर्शन में नारद भक्ति सूत्र के चिन्तनशील अध्ययन के अंग के रूप में लेना सर्वोत्तम है।