अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः
अन्य नाम / खोज: athato bhaktim vyakhyasyamah · narada bhakti sutra 1 · narada bhakti sutra first sutra · athato bhaktim
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✦ अर्थ
यह नारद भक्ति सूत्र का प्रथम सूत्र है, जो प्रेममयी भक्ति के मार्ग का आधारभूत ग्रन्थ है और देवर्षि नारद को प्रदान किया जाता है। ब्रह्मसूत्र आदि शास्त्रों के प्रसिद्ध आरम्भ की भाँति यह भी 'अथातः' अर्थात् 'अब, इसलिए' से प्रारम्भ होता है, यह घोषित करते हुए कि अधिकारी साधक के लिए अब भक्ति के परम मार्ग के व्याख्यान का समय आ गया है। अगले दो सूत्र तत्काल इसका सार दे देते हैं — भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम (परम-प्रेम) के स्वरूप वाली है, और वह अमर, अविनाशी आनन्द (अमृत) के स्वरूप वाली है। मिलकर वे सम्पूर्ण ग्रन्थ का विषय — भक्ति, अर्थात् ईश्वर-प्रेम — घोषित कर देते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Narada Bhakti Sutra, Sutra 1 · Attributed to Devarshi Narada · Ancient (classical period of the Bhakti tradition)
नारद भक्ति सूत्र, महान् दार्शनिक ग्रन्थों की भाँति, 'अथ अतः' — 'अब, इसलिए' — शब्दों से आरम्भ होता है। (परम्परा में) यह स्थापित कर देने के बाद कि साधक निम्न प्रवृत्तियों से विमुख होकर परम के लिए तैयार है, ऋषि नारद घोषित करते हैं कि वे अब भक्ति — प्रभु के प्रति प्रेममयी भक्ति का मार्ग — का व्याख्यान करेंगे। यह एक ही उद्घाटन सूत्र सम्पूर्ण ग्रन्थ का विषय निर्धारित कर देता है, जो आगे चलकर भक्ति को परम प्रेम के स्वरूप रूप में परिभाषित करता है और उसे वह साधन दर्शाता है जिससे मनुष्य पूर्ण, अमर एवं परम तृप्त हो जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा कहती है कि नारद ने स्वयं प्रभु के ऐसे ही एकनिष्ठ प्रेम के द्वारा भक्तों में अग्रणी का अपना उच्च पद प्राप्त किया, और यह कि इस सूत्र से सही भाव में भक्ति का अध्ययन मात्र आरम्भ करना ही हृदय को ईश्वर की ओर मोड़ देता है और उसे आगे के सूत्रों में वर्णित आनन्द के लिए परिपक्व करने लगता है।
मंत्र
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अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा ॥ २ ॥ अमृतस्वरूपा च ॥ ३ ॥
athāto bhaktiṃ vyākhyāsyāmaḥ (1) sā tv asmin parama-prema-rūpā (2) amṛta-svarūpā ca (3)
अर्थ:अब, इसलिए, हम भक्ति का (स्वरूप का) व्याख्यान करेंगे। (१) वह (भक्ति) उस (भगवान) के प्रति परम प्रेम के स्वरूप वाली है। (२) और वह अमृत-स्वरूपा (अमरता एवं आनन्द के स्वरूप वाली) है। (३)
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः पाठ के लाभ
नारद भक्ति सूत्र का उद्घाटन करता है, जो प्रेममयी भक्ति (भक्ति योग) के मार्ग का सर्वोच्च शास्त्र है।
मंगल-शब्द 'अथ' (अब) स्वयं ही आशीर्वाद माना जाता है, जो साधक की आध्यात्मिक तत्परता के उदय को सूचित करता है।
स्थापित करता है कि भक्ति ब्रह्म-जिज्ञासा के समान ही एक योग्य एवं पूर्ण जिज्ञासा का विषय है।
नारद भक्ति सूत्र के अध्ययन या पाठ से पूर्व पवित्र आरम्भ रूप में जप किया जाता है।
भक्त को स्मरण कराता है कि प्रेम के मार्ग को केवल अनुभव ही नहीं, सीखना और जीना भी चाहिए।
गहन उपदेश के उद्घाटित होने से पूर्व हृदय एवं मन को भक्ति के भाव में स्थापित करता है।
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः जप विधि
इस आरम्भिक सूत्र का धीरे और श्रद्धापूर्वक पाठ करें, इसे भक्ति के उपदेश में प्रवेश का द्वार मानते हुए। 'अथ' (अब) शब्द पर ठहरें, यह अनुभव करते हुए कि यही क्षण प्रेम के मार्ग को ग्रहण करने का मंगल समय है। फिर इसके पश्चात् आने वाले सूत्रों के साथ आगे बढ़ें जो भक्ति के स्वरूप को परिभाषित करते हैं। इसे पारम्परिक रूप से सम्पूर्ण नारद भक्ति सूत्र के अध्ययन के आरम्भ की मंगल-स्तुति के रूप में जप किया जाता है।