Mantra.Tips

वैष्णव जन तो Meaning — Line by Line

वैष्णव जन तो

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of वैष्णव जन तो with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

Jump to a verse ▾
  1. Verse 1. Vaishnav jan to tene kahiye, je peed parai jane re
  2. Verse 2. Sakal lokma sahune vande, ninda na kare keni re
  3. Verse 3. Samdrishti ne trishna tyagi, parastri jene maat re
  4. Verse 4. Moh maya vyape nahi jene, dridh vairagya jena manma re
  5. Verse 5. Vanlobhi ne kapatrahit chhe, kaam krodh nivarya re
Verse 1#

Vaishnav jan to tene kahiye, je peed parai jane re

वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीड़ पराई जाणे रे। पर दुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान आणे रे॥

Vaishnav jan to tene kahiye, je peed parai jane re Par dukhe upkar kare toye, man abhiman na ane re

Meaningवैष्णव जन उसी को कहिए जो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा जाने; जो दुखियों पर उपकार करे फिर भी मन में अभिमान न लाए।

Verse 2#

Sakal lokma sahune vande, ninda na kare keni re

सकळ लोकमां सहुने वंदे, निंदा करे केनी रे। वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे॥

Sakal lokma sahune vande, ninda na kare keni re Vach kachh man nishchal rakhe, dhan dhan janani teni re

Meaningजो सब लोगों को वंदन करे, किसी की निंदा न करे, वाणी, कर्म और मन को निश्चल रखे — धन्य है उसकी जननी।

Verse 3#

Samdrishti ne trishna tyagi, parastri jene maat re

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। जिह्वा थकी असत्य बोले, परधन नव झाले हाथ रे॥

Samdrishti ne trishna tyagi, parastri jene maat re Jihva thaki asatya na bole, pardhan nav jhale haath re

Meaningजो समदृष्टि रखे, तृष्णा का त्याग करे, पराई स्त्री को माता समान माने; जिह्वा से असत्य न बोले, पराये धन को हाथ न लगाए।

Verse 4#

Moh maya vyape nahi jene, dridh vairagya jena manma re

मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे। रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे॥

Moh maya vyape nahi jene, dridh vairagya jena manma re Ramnaam shu tali re lagi, sakal tirath tena tanma re

Meaningजिसे मोह-माया व्यापे नहीं, जिसके मन में दृढ़ वैराग्य हो, जो राम-नाम में लीन रहे — समस्त तीर्थ उसके शरीर में बसते हैं।

Verse 5#

Vanlobhi ne kapatrahit chhe, kaam krodh nivarya re

वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥

Vanlobhi ne kapatrahit chhe, kaam krodh nivarya re Bhane Narsaiyo tenu darshan karta, kul ekoter tarya re

Meaningजो लोभरहित और कपटरहित हो, काम-क्रोध को त्याग चुका हो — नरसिंह कहते हैं, उसके दर्शन से इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं।

Word-by-Word Breakdown

वैष्णव जन तो तेने कहिए
Vaishnav jan to tene kahiye
उसी व्यक्ति को सच्चा वैष्णव (भगवान का भक्त) कहो
जे पीड़ पराई जाणे रे
je peed parai jane re
जो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझे
पर दुःखे उपकार करे
par dukhe upkar kare
जो दुखियों की सहायता करे
मन अभिमान न आणे रे
man abhiman na ane re
फिर भी मन में अभिमान न आने दे
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी
samdrishti ne trishna tyagi
सबको समान दृष्टि से देखे, तृष्णा से मुक्त
परस्त्री जेने मात रे
parastri jene maat re
जो पराई स्त्री को अपनी माता समझे
रामनाम शुं ताळी रे लागी
Ramnaam shu tali re lagi
राम के नाम में लीन
कुळ एकोतेर तार्या रे
kul ekoter tarya re
जिनके दर्शन मात्र से इकहत्तर पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है

Origin & History

Source: Composed by Narsinh Mehta (Gujarati bhakti tradition); popularised nationally by Mahatma Gandhi

Author: Narsinh Mehta

Period: 15th century

गुजरात के अग्रणी कवि-संत नरसिंह मेहता ने सम्पूर्ण भक्ति-नीति को इस एक गीत में समाहित किया: सच्चा वैष्णव करुणा, नम्रता और सत्य से परिभाषित होता है, कर्मकांड से नहीं। शताब्दियों बाद महात्मा गांधी ने इसे अपने आश्रम और स्वतंत्रता आंदोलन का गान बना दिया, जो हर प्रार्थना-सभा में गाया जाता था — इस प्रकार एक मध्यकालीन गुजराती भजन समूचे भारत के लिए अंतःकरण का गीत बन गया।

Frequently Asked Questions

वैष्णव जन तो किसने लिखा?
पंद्रहवीं सदी के गुजराती संत-कवि नरसिंह मेहता ने। यह महात्मा गांधी के प्रिय भजन के रूप में विश्वविख्यात हुआ, जो उनकी प्रार्थना-सभाओं में नित्य गाया जाता था।
वैष्णव जन तो क्या सिखाता है?
कि भगवान का सच्चा भक्त बाह्य कर्मकांड से नहीं, अपितु चरित्र से पहचाना जाता है — दूसरों की पीड़ा अनुभव करना, बिना अभिमान के सेवा करना, सत्य बोलना, लोभ, काम और क्रोध पर विजय, तथा भगवान के नाम में लीन रहना।
गांधी को यह भजन क्यों प्रिय था?
क्योंकि इसमें उनका नैतिक, करुणामय जीवन का आदर्श समाया था। यह दांडी यात्रा पर और साबरमती आश्रम में गाया जाता था, और आज भी भारत में अंतःकरण का राष्ट्रीय गीत बना हुआ है।

Ready to start chanting?

See Benefits & How to Chant →